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गुरुवार, 2 जुलाई 2020

कभी भी ना भूलनेवाला डर का सफर...

  

    यूँ तो जीवन का हर पल अनिश्चितताओं से भरा होता है ,कब क्या हो जाएं पता नहीं। वैसे ही जब हम कही यात्रा पर निकलते हैं तो हमें नहीं पता होता कि-आगे क्या होगा। फिर भी यात्रा पर निकलते वक़्त हम अमूमन घर से अच्छा ही सोचकर निकलते है कि -"हमारा सफर सुखद होगा सुरक्षित होगा "ये अलग बात है कि-कभी-कभार सफर में कुछ चाहा या अनचाहा घटना घटित हो जाता हैं।
    मगर इस बार मेरा ट्रेन का सफर जितना भयावह था,अब से पहले कभी नहीं रहा। मुंबई से दिल्ली जाने के सफर की तैयारी करते वक़्त पहली बार सफर के अनिश्चितता का आभास और डर पहले से ही हावी हो चूका था (लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद मुंबई से दिल्ली अपने परिवारवालों के पास जाना था) टिकट बनने के दिन से ही एक दहशत मन मस्तिष्क पर हावी हो गया था। डर किससे रहे है ये भी समझ नहीं आ रहा था। ट्रेन में चोरी डकैती या एक्सीडेंट जैसी घटनाओं से क्या डरना,इन अनहोनियों के साथ सफर करने की तो आदत बन चुकी हैं। जहां तक मौत से डरने की बात है तो उससे क्या डरना वो तो कही भी किसी भी वक़्त आ सकता हैं। फिर भी एक अनदेखा सा दुश्मन हर पल आस पास नजर आ रहा था।
    घर से निकलते वक़्त हम माँ बेटी ने खुद को पूरी बाजु के कपडे ,मास्क,दस्ताने,चश्मे आदि से हर तरफ से ऐसे ढक लिया था जैसे जंग पर जाते समय सिपाही खुद की सुरक्षा के लिए सुरक्षा कवच पहनते हैं। हम सचेत थे,ताकि वो मौत का वायरस कही से भी हमारे शरीर में प्रवेश ना कर सके। अपनी रक्षा के लिए हाथ में एक छोटा सा गन (स्नेटाइजर का बोतल) भी ले रखा था ताकि हम उस अनदेखे दुश्मन पर वार कर सकें। टेक्सी में बैठते वक़्त पूरी टेक्सी को सेनेटाइज कर खुद को ये यकीन दिलाने की कोशिश की कि -ये क्षेत्र दुश्मनों से रहित हो गया। अगला पड़ाव ट्रेन,वहां भी हमने बड़ी सावधानी से अनदेखे दुश्मन पर वार कर उसे मारने की कोशिश की। ये सब करते हुए समझ ही नहीं आ रहा था कि -हम मार किसे रहे हैं?आज से पहले ट्रेन के सफर के सहयात्री थोड़ी देर के लिए ही सही अपने परिवार से लगते थे मगर आज वही सहयात्री (खास तौर पर जो लापरवाह थे)चलते फिरते मौत के वाहक नजर आ रहे थे।
   जीवन में मैं कभी भी किसी भी चीज़ से नहीं डरी ,डरना मैंने सीखा ही नहीं,जीवन में अब से पहले कभी डर का एहसास ही नहीं हुआ था। मगर पहली बार मुझे डर लग रहा था ।जीवन के इस अनोखे,डरावने सफर के 20 घंटे का एक एक पल दहशत भरा था। क्योँकि अब से पहले किसी भी बिपदा या दुश्मन का सामना करते वक़्त एक इत्मीनान रहता था कि " अगर कुछ बुरा हुआ तो सिर्फ मेरा होगा" मगर इस बार ये डर कि -ये अनदेखा दुश्मन मुझे भी मौत का वाहक तो नहीं बना लेगा, अपनों के पास पहुंचने की बेताबी में " कहीं मैं उनके लिए बिपति की वजह तो नही  बन जाउंगी" खुद का अहित हो कोई बात नहीं मगर अपनों का अहित मेरी वजह से...ये सोचकर भी मैं काँप जा रही थी। 
    खैर,भगवान का स्मरण करते हुए हम दिल्ली पहुंचे तो अपनों को गले भी ना लगा सकें,उन्हें छू भी ना सकें,खुद को उनसे ऐसे दूर रखा जैसे हमें कोई "छूत" का रोग लगा हो। फिर पास-पास रहते हुए भी 14 दिन अछूतों की तरह अलग अलग रहकर अलगाव का दंश झेलना,वो 14 दिन का सफर जो रुका हुआ था उसका एक एक दिन जब गुजर जाता तो ये ढाढ़स होता कि-"शायद दुश्मन हमारे शरीर में प्रवेश नहीं कर पाया हैं और हम जीने के काबिल हैं और दूसरों को भी जीवन देने के काबिल हैं।" 
   कहने को तो उस सफर की समय अवधि 20 घंटे की थी मगर हमारा सफर 20 दिन का था,सफर शुरू करने के पहले का पांच दिन सफर पर निकलने की हिम्मत जुटाने का,एक दिन का ट्रेन का सफर और 14 दिन इस इंतजार का कि-"कही मौत के वायरस ने हमें छुआ तो नहीं।"
    जो बीस दिन के डर और दहशत के सफर से हम गुजरे,उसी पीड़ा से ना जाने कितने गुजरे होंगे और अभी भी गुजर रहे हैं।अपनों के पास होकर भी अपनों से नहीं मिल पाने की पीड़ा इस बात का एहसास करा रही थी कि -" यकीनन प्रकृति हमें अपनों की अवहेलना करने की गुनाह की सजा दे रही  हैं। 
    परन्तु मन सवाल कर रहा था -"ये गुनाह हमनें तो कभी नहीं किया ,फिर हमारे साथ ऐसा क्यों ?जबाब मिला -"अक्सर जौ के साथ घुन भी पीसते हैं" क्योँकि घुन जौ के साथ जो रहता हैं। हम भी कुछ लापरवाह और गैरजिम्मेदाराना लोगो के साथ रहते हैं और ख़ामोशी से उनके गलतियों को देखते रहते हैं तो हमें भी सजा मिलनी लाजमी हैं न।  मेरे पापा एक भजन गया करते थे -
"आदमी आदमी को सुहाता नहीं 
आदमी से अरे, डर रहा आदमी " 
आज ये सौ फीसदी सत्य हो चूका हैं....और हम सब इसके गवाह बन चुके हैं..
" जीवन में कभी भी ना भूलनेवाला डर का सफर,मगर साथ ही साथ ये विश्वास
 कि  हमनें कुछ गलत नहीं किया हैं तो हमारे साथ कुछ बुरा हो ही नहीं सकता.... "





गुरुवार, 14 मई 2020

जब लिट्टी खाना महंगा पड़ा

  

   बात उन दिनों की हैं जब मैं 9 वी क्लास में थी। मैं और पापा,  दुमका ( झारखंड ) से मुजफ्फरपुर (बिहार) की  ट्रेन में सफर कर रहे थे।उन दिनों रिजर्वेशन का खास मसला नहीं होता था। जेनरल कम्पार्टमेंट में भी सफर आरामदायक ही होता था। आज की जैसी आपा -धापी तो थी नहीं। ज्यादा से ज्यादा सफर जरूरतवश ही की जाती थी। ट्रेन में खोमचे वालों ( खाने -पीने का समान बेचने वाले ) का आना- जाना भी लगा रहता था। खाते-पीते सफर आराम से कट जाता था। बिहार की एक खास पकवान लिट्टी -चोखा उस लेन में ज्यादा से ज्यादा बिकने वाली लाज़बाब पकवानो में से एक होता था। 
    ट्रेन अपनी रफ्तार से चली जा रही थी ,रात के करीब आठ बजे थे, एक लिट्टी -चोखा बेचने वाला हमारी कम्पार्टमेंट में चढ़ा। अपनी लिट्टी- चोखे की तारीफ करता हुआ , वो बार बार पैसेंजरों को उन्हें खाने के लिए उकसाने की कोशिश कर रहा था। सबके पास जाकर बोलता -" भाई जी आप लेलो ,अंकल जी आप खा लो बस दस में चार दे रहा हूँ। " मगर कोई भी उसकी ओर ध्यान नहीं दे रहा था। सब घर से लाए अपने खाने को खाने में लगे रहें। जब नौ बजने को आया तो अचानक उसके सुर में बदलाव आ गया ,उसने कहा -"  अरे ,भाइयों एक घंटे में गोंडा स्टेशन आ जाएगा.. मैं वहाँ उतर जाऊँगा ..मेरा वही घर हैं न ...अब मेरी लिट्टी तो बिकी नहीं घर जाकर इसे फेकना ही होगा ....आप में से जो कोई भी भूखा हो और खाना चाहते हो वो आकर खा ले ...फेकने से अच्छा हैं किसी के पेट में चला जाए ....फ़िक्र ना करे मैं फ्री में खिलाऊँगा ....एक पैसा भी नहीं लूँगा। "
   फिर क्या था सब भूखे भेड़िये की तरह उसकी लिट्टी पर टूट पड़े हर एक ने जी भरकर खाया ,उसने पापा से भी कहा -" अरे ,अंकल जी आप नहीं खोओगे ,अरे खाओ- खाओ में पैसे नहीं लूंगा "पापा मेरे बड़े मधुरभाषी थे उन्हेने बड़े प्यार से कहा -"अरे ,बेटा जी आप आने में देर कर दिए थे....हम तो आपके आने से पहले ही खाना खा चुके थे वरना लिट्टी तो मेरा पसंदीदा हैं.... आप बीस के चार भी देते तो खा लेता ....लेकिन अब नहीं ,आपकी लिट्टी फ्री हैं मेरा पेट तो नहीं " फिर पापा धीरे से मुझसे बोले -" बेटा मुझे तो दाल में कुछ काला लग रहा हैं ,आप चुपचाप जाकर ऊपर वाले बर्थ पर सो जाओं। " मैं  सोने चली गई। मगर नींद कहाँ आ रही थी बस सोने का नाटक कर रही थी। 
    जब लिट्टी वाले की टोकरी खाली हो गई तब वो बड़े अड़ियल अंदाज़ में बोला -" क्युँ भईया सब का पेट भर गया न।" सब डकार मरते हुए खुश होकर बोले -" अरे भाई ,बहुत बहुत धन्यवाद तुमको ...आज तो मज़ा आ गया।" अब लिट्टी वाले ने फिर अपना  सुर बदला -"  भईया जी, आपके धन्यवाद का मैं आचार डालूंगा क्या .....धन्यवाद नहीं पैसे निकले ....दस का एक के हिसाब से....समझे।" अब बारी सभी के चौकने की थी ,सब एक सुर में बोले -" तुमने कहा था कि- फ्री हैं ?"  उसने गंदी गाली देते हुए कहा -" बाप का माल समझे थे....एक घंटे से मैं सबकी मिन्नत कर रहा था कि -कोई तो गरीब पर तरस खा ले और मेरी कुछ लिट्टी तो बिक जाए ....मगर किसी को भूख नहीं थी और फ्री का सुनते ही सबके पेट में कुआ बन गया सब ठूँसने लगे .....अब पैसे निकालों नहीं तो एक एक को खींचकर ट्रेन से नीचे फेक दूंगा..... अरे, सच तो सिर्फ अंकल जी लोग बोल रहे थे ...चलो अंकल जी,  आप सब ऊपर बर्थ पर जाकर सो जाओं.... अब मैं इनका पेट खाली करने वाला हूँ- वो पापा और उनके साथ ही बैठे दो तीन बुजुर्गो की तरफ देखते हुए बोला.... फिर मेरी तरफ देखते हुए बोला -अच्छा हैं बिटिया सो गई है ....चलो बिटिया,  तुम अपना मुँह उस तरफ कर लो।" मैं समझ गई अब तो कुछ भयंकर होने वाला हैं क्योकि गोंडा के किस्से बड़े प्रसिद्ध थे  ,मैंने झट मुँह फेर लिया। 
    वो  जब लिट्टी खिला रहा था तो बड़े ही चालाकी से ये कहते हुए कि -" अरे भईया आपने तो अभी दो ही लिए दो और लेना " उसने सबकी लिट्टी की गिनती  भी कर ली थी और सबसे कबुलवा भी लिया था, तो झूठ बोलने की गुंजाइश थी नहीं किसी के पास। जो लोग लालची तो थे मगर थोड़ा सरीफ थे,  वो तो डरकर पैसे निकालने लगे।मगर कुछ लोग जो खुद को उससे बड़ा गुंडा समझते थे भिड़ गए उससे। बाता -बाती ,गाली -गलौज,हाथापाई तक होने लगा।  ट्रेन के गोंडा स्टेशन पर रुकाते ही उस लिट्टी वाले ने जोर से मुँह से कुछ आवाज़ निकली ( शायद कोई कोडबर्ड था )उसकी आवाज़ सुनते ही एक मिनट भी नहीं लगा सेकड़ो भेंडर्स इकट्ठे  हो गए ,यात्रियों को खींच खींचकर ट्रेन से उतारने लगे। रलवे के स्टाफ ,टी.सी ,सब आ गए। टी. सी. ने सबको समझाया- इनसे टककर लेने का कोई फायदा नहीं... तुम सब जब तक पैसे नहीं दोगे ट्रेन आगे नहीं बढ़ेगी... पाँच मिनट में ही सारे गाँववाले भी इकट्ठे हो जाएंगे फिर तो मार -काट ही मच जाएगा। आख़िरकार यात्रियों को पैसे देने ही पड़े वो भी दस के एक के हिसाब से। पुरे कम्पार्टमेंट में बस सात लोग ( मुझे और पापा को लेकर ) थे जिन्होंने लिट्टी नहीं खाई थी ,हम ट्रेन में ही थे मगर किसी अनहोनी के डर से हमारा गला भी सुख रहा था। खैर ,आधे घंटे के लफड़े के बाद ट्रेन वहाँ से रवाना हुई और हमारी जान में जान आई। 
  फ्री के खाने का संस्कार तो हमारा था नहीं फिर भी उस दिन ये दो कसम जरूर खा ली मैंने कि -" भूख से मर जाऊँगी मगर फ्री का नहीं खाऊँगी और दूसरी कभी भी ट्रेन में भेंडर्स से या यात्रियों से ही बेवजह मुँह नहीं लगाऊँगी। "ये कसम आज तक निभाती हूँ। 







शुक्रवार, 8 मई 2020

" मामा के घर "जाने का रोमांचक सफर....

    बात उन दिनों की हैं जब मैं 11 -12 साल की थी। गर्मी की छुटियों में हर साल हम मामा के घर जाते थे।  मगर उस साल,  ना मामा को फुरसत मिल रही थी कि -वो आकर हमें ले जाएं , ना ही पापा को फुरसत थी कि- वो हमें मामा के घर छोड़ आए। हम भाई बहन पापा से ज़िद करने लगे कि- वो हमें बस में बैठा दे,  हम चले जायेगे।मामा के घर के करीब ही बस स्टेण्ड था सो,  घर तक अकेले जाना कोई मुश्किल नहीं था।  हमारे बहुत ज़िद करने पर पापा हम चारों भाई -बहन को बस में बैठा दिए ,मुश्किल से एक घंटे का रास्ता भी नहीं था और बस के ड्राइवर और कंडक्टर मामा को जानते थे सो पापा आश्वस्त थे कि बच्चे सही सलामत पहुँच ही जाएंगे। पापा ने ताकीद की कि -वहाँ पहुँचकर मामा को बोलना किसी के हाथ कल एक चिट्ठी भेज दे कि तुम लोग सही सलामत पहुँच गए हो।उस ज़माने में मोबाईल तो था नहीं। 
    पापा की सारी बातों को गाँठ बांधकर कर हम चारो  निकल पड़े " मामा के घर के सफर " पर। सबसे बड़े भईया 15 साल के मैं 12 साल की ,मेरी छोटी बहन 9 साल की और सबसे छोटा भाई जिसे हम साथ ले जाना तो नहीं चाहते थे पर वो भी रो- धोकर साथ हो चला था 7 साल का। घर से निकलते वक़्त तो लगा था बस एक घंटे में हम मामा के घर होंगे कोई फ़िक्र की बात ही नहीं हैं ,मगर किसे पता था- अगले पल क्या होने वाला हैं ?
   मामा के घर से करीब 5 -6 किलोमीटर पहले ही बस खराब हो गई और पता चला अब वो बस आगे नहीं जायेगी और ना ही वहाँ से कोई  दूसरी  बस ही जायेगी । ड्राइवर ने हमसे कहा कि-बच्चों, तुम सब यही बैठो... घर वापसी के लिए एक घंटे बाद की बस हैं... मैं तुम्हे उसमे बैठा दूँगा ...तुम सब घर वापस चले जाओ। ।अब तो हम फँस चुके थे,  शाम के साढ़े चार -पाँच का वक़्त था।  भईया छोटू पर गुस्सा करने लगे कि- अगर तुम साथ नहीं होते तो हम तीनो पैदल ही निकल पड़ते ,छोटू रोने लगा। मैंने भईया से पूछा -क्या हम लोग इतनी दूर पैदल चल पाएंगे ? अरे, ये समझो कि-  हम अपने खेल के मैदान में एक घंटे तक दौड़ लगा रहे हैं बस ...इससे ज्यादा तो हम रोज ग्राउंड में दौड़ते हैं- भईया  हमारा जोश बढ़ाते हुए बोले । फिर क्या था छोटू भी सीना ताने बोल पड़ा -" मैं भी दौड़ लूँगा एक घंटे।" अब बारी गुड़िया की थी वो ठुनकने लगी- " मेरे पैर में दर्द हो जायेगा।" मैंने उसे प्यार से समझाया- " घर पहुँचेगे न तो मामी तुम्हारे पैरों में तेल मालिस कर देगी.. फिर अच्छा अच्छा खाना भी मिलेगा..अगर आज वापस लौट गए तो... फिर ये छुट्टी हम मामा के घर नहीं बिता पाएंगे ,समझी । मेरे समझाने पर गुड़िया राजी हो गई फिर क्या था... .ड्राइवर की नजरों से खुद को बचाते हुए.... हम चारो चरणबाबू का टमटम पकडे  ( यानि पैदल )  और निकल पड़े अपनी मंजिल की ओर.. आगे की मुसीबत से बेखबर ....

    अभी आधा दूर ही गए थे कि काली -काली घटाएं  घिरने लगी... तेज हवाएं चलने लगी। आपको ये भी बता दे कि- इस मौसम की ये पहली घटा थी और.... इसे भी आज ही घिरना था। थोड़ा- थोड़ा डर तो लगने लगा मगर एक दूसरे की हिम्मत बढ़ाते आगे बढ़ने लगे।  हम तो अपनी मस्ती में दौड़े जा रहे थे तभी  किसी ने  हमें आवाज़ दी -" ऐ बच्चा पार्टी कहा भागल जातर लोग " पीछे मुड़े तो एक बुढ़िया हमें बुला रही थी। हम एक दूसरे की तरफ देखने लगे ..." ये अचानक कहाँ से आ गई ....कही कोई जादूगरनी या भुत  तो नहीं हैं " -भईया हमें डराते हुए बोले। छोटू गुड़िया तो डर गए लेकिन मुझे तो दुनिया के किसी चीज़ से डर लगता ही नहीं था... सो, मैं निडर होकर उसके पास जाकर बोली -"आपको क्या मतलब हम कही भी जाए " बुढ़िया प्यार से बोली - " मतलब कईसे नईखे .....चार बच्चा लोग केहू के घर के हीरा -मोती होखब लोग .....आ एतना ख़राब मौसम होता ...बोल कवना गाँव जातर लोग।"  उसकी बाते सुन मुझे अच्छा लगा, मैंने उसे मामा के गाँव का नाम बता दिया। गाँव का नाम सुन वो खुश हुई फिर पूछी  "-केकरा घरे जातर लोग " हमने अपने नाना जी का नाम बताया। नाना जी का नाम सुनते ही जैसे वो चौकी ,बोली -" तू लोग उनकर का लागेल " मैं थोड़ी अकड़ती हुई बोली -" उनके नाती -नतनी हैं हम।" इतना सुनते ही बुढ़िया अपनी गठरी को नीचे रखी और हम सब को बारी -बारी से  पकड़कर चूमने लगी । " तू लोग मालती के बाल बच्चा हव लोग....हे , भगवान मलकिनी जिन्दा रहती त उनकर कलेजा जुडा जाईत, ई लाल लोग के देख के....तरसत चल गईल उनकर आखियाँ... ऐगो नाती देखे
खाती...आज चार चार गो लाल भगवान देहले "-बुढ़िया हमें चूमते भी जा रही थी, रो भी रही थी और साथ ही साथ बोले भी जा रही थी। मैंने पूछा -" आप मेरी नानी को जानती थी।" हाँ ,बबुनी उ देवी के त पाँच गाँव के लोग जाने ला....अउरो कईसे ना जानी.....जले सबका घर के चूल्हा ना जलत रहे उ मलकिनिया अपन चूल्हा ना जलावत रहे ....अच्छा अच्छा पहले तेज़- तेज़ चल लोग बड़ी तेज़ आंधी पानी आवता....अब त जले तहरा लोग के सही सलामत घरे ना पहुँचा देम , तले हमरा चैन ना मिली "
    हम तेज़ तेज़ क़दमों से उसके साथ चलने लगे और वो हमें हमारी नानी की गुणगान सुनाती रही, हर बात पर उसकी आँखें भर जाती थी ,कैसे मेरी नानी हर एक के सुख दुःख का ख्याल रखती थी,  वो इतनी निडर थी कि -सच की लड़ाई में वो सबका साथ देती थी ,गाँव के बच्चे से बूढ़े तक उनसे डरता भी था और उनका सम्मान भी करता था , गाँव की हर लड़की को , औरतो को सिलाई कढ़ाई सिखाती थी,  उन्हें इतना जरूर पढ़ा देती कि वो चिट्टी लिखने ,रामायण पड़ने के काबिल हो सके ,उसने बताया कि- मेरी माँ के शादी के तीन साल बाद जब मेरे भईया माँ के गर्भ में आठ महीने के थे ,तभी वो कैंसर रोग से पीड़ित होकर, एक नाती को देखने की लालसा लिए हुए इस दुनिया को छोड़कर चली गई,  कैसे उनके मरने के बाद सिर्फ उन्ही का गाँव नहीं बल्कि आस पास के कितने गाँव के लोग उनके लिए रोये थे  ,  नानी के मरने के बाद नाना जी मेरे सन्त से हो गए थे और मेरी बड़ी मामी वहाँ रहती नही थी सो,  सबने वो आँगन छोड़ दिया था।वो मेरी छोटी मामी की तारीफ भी करने लगी कि - उनके आने के बाद वो घर फिर से बसने लगा हैं। छोटे मामा के शादी का दो साल ही हुआ था ( और वो लोग गाँव में ही रहते थे ) हमें भी छोटी मामी से ही लगाव था, इसीलिए तो उनके पास भागे जा रहे थे। 
   अपनी नानी की जीवन गाथा सुन, हमारी भी आँखे भर आई थी।  वो बुढ़िया हमारे साथ गाँव के सीमा तक आई, जब हमने उसे आश्वस्त किया कि- हम यहाँ से सुरक्षित चले जायेगे आप जाए, बारिस बहुत तेज़ होने वाली हैं,  आपको भी तो अपने घर पहुंचना हैं ,तब वो आगे गई।हमने भी उन्हें नानी कहकर उनके पैर छुए और उन्होंने हमें गले से लगा लिया और ढेर सारी दुआएं दी। 
   उस दिन छोटी उम्र में ही मुझे ये सबक मिल गया था कि -इंसान तो मर जाता हैं पीछे रह जाता हैं उसका व्यक्तित्व जो उसे पूजनीय या निंदनीय बनाता हैं। खैर ,हम जैसे ही गाँव में प्रवेश किए तेज़ बौछार के साथ बारिस शुरू हो गई ,गाँव में घुसते ही कुछ लोगो ने हमें पहचान लिया सब थोड़ी हैरत और ख़ुशी से हमें अपने कन्धे पर बिठा लिये ,मुझे तो उठाकर ये कहते हुए सब नाचने लगे  कि -"रानी आई पानी लाई  " सब की आँखे  बरसात की बून्द के लिए तरस  रही थी। क्योँकि धान के रोपनी का समय बीतता जा रहा था और खेत सूखे पड़े थे। सब हमें कन्धे पर उठाये ही घर तक पहुँचे,  हमें देखकर ख़ुशी और आश्चर्य से मामा के तो होश ही उड़ गए।  लेकिन हमने उन्हें नहीं बताया कि- हम यहाँ तक कैसे आए हैं और गाँव वाले तो बारिस के ख़ुशी में मग्न थे तो वो तो हमें लेकर नाच ही रहे थे। अगले दिन मामा ने पापा को खबर भिजवा दिया कि -" बच्चे पहुँच गए "अब बच्चे घर तक कैसे पहुँचे थे ये राज तो 7  दिन बाद खुला, जब वो बुढ़िया नानी हमसब से मिलने घर आई। तब तक बात पुरानी हो गई थी, सब बस किस्से सुनकर हँस रहे थे। गाँव वालो ने तब तक हमें घर लौटने नहीं दिया जब तक उनकी रोपनी खत्म नहीं हुई, क्योंकि जब तक हम थे बारिस खूब हुई ।  हमें तो सबने इंद्रदेव ही समझ लिया था। सच ,कितने भोले और निश्छल होते हैं गाँव के लोग।
  
    तो ये थी, हमारी पहली रोचक सफर की गाथा .....फिर मिलते हैं अगले सफर में ....

रविवार, 26 अप्रैल 2020

सफर के रोचक किस्से...

" जिन्दगी एक सफर हैं सुहाना
यहाँ कल क्या हो किसने जाना "
जीवन को एक अलग दृष्टिकोण देता , एक सदाबहार गीत

     जिन्दगी अनिश्चितताओं से भरा एक सफर तो हैं ही... किस पल क्या हो,  पता नहीं।हम अपनी योजनाएं  बनाते रहते हैं और जिंदगी एक पल में सब धराशाही कर देती हैं। खैर ,यहाँ मैं जिन्दगी के सफर की बात नहीं कर रही। " सफर " यानि " यात्रा " यानि वो यात्रा जो हम गाहे -बगाहें करते ही रहते हैं कभी जरूरत में, कभी मज़बूरीवश  ,कभी शौकिया और  कभी यूँ ही। मैंने भी अपने जीवन में बहुत सी यात्राए की हैं ज्यादातर जरूरतवश ही या मज़बूरी में। बचपन से लेकर अब तक मेरी लगभग हर यात्रा जाने -अनजाने ही एक अलग ही रोचक मोड़ ले लेती हैं.. जो उम्मीद से परे होता था...
     परन्तु ,हर सफर हमें कोई ना कोई सबक  जरूर देकर जाता था.... कुछ यात्राएं बेहद डरावनी भी रही.... जिसने ये समझा दिया कि -" किसे पता कब क्या हो " वैसे तो हमारी पूरी जीवन -यात्रा ही एक सबक हैं आपके जीवन का हर लम्हा आपको कुछ न कुछ सीखाने या समझाने ही आता हैं....बस,  हम ही उस पर गौर नहीं करते। जिसने भी गौर किया उसे जीवन जीने की कला आ गई। अब देखिये न ,ये " कोरोना काल " भी हमें कितना कुछ सीखा रहा हैं।  अभी तो हम इसकी चर्चा -परिचर्चा भी कर रहे हैं मगर जब ये " काल " का वक़्त गुजर जाएगा तब हम में से दस प्रतिशत लोग भी अगर इस सीख को याद रख लगे तब भी सृष्टि में बहुत कुछ बदलाव हो जाएगा। 
मेरे लिए तो ये कोरोना काल भी एक सफर ही साबित हो रहा हैं मगर हिंदी वाला  safar ( यात्रा )  नहीं इंग्लिश वाला suffer ( भुगतना ) . वैसे तो भुगत सब रहे हैं पर मैं परिवार से दूर हूँ तो...उसका दर्द ज्यादा हो रहा। जब भी परिवार के पास जाने की तैयारी कर रही हूँ....लॉकडाउन की तारीखे फिर से बढ़ जा रही हैं। अब देखते हैं, मेरा अगला " सफर " कब शुरू होने वाला हैं और कितना रोचक होगा " पता नहीं "वैसे दुआ यही करुँगी कि -बस सही सलामत घर पहुँच जाऊँ अपनों के पास। 

    खैर ,तो मैं बात कर रही थी अपने जीवन के रोमांचक यात्राओं के बारे में.... तो मेरे इस नए ब्लॉग में.... मैं आप सब से अपने सफर के कुछ रोचक किस्से साझा करुँगी ....मुझे उम्मीद हैं, आपको पढ़कर मजा आएगा और आप सोचने पर मजबूर भी होंगे कि -किसी एक इंसान के साथ इतनी सारी घटनाएं घट सकती हैं क्या ? यकीनन आप सब के साथ भी ऐसा कुछ हुआ  ही होगा पर शायद आपने गौर ना किया हो। तो मेरी ये यात्रा वृतांत पढ़कर आपको भी अपनी कहानी जरूर याद आएगी।  अगर याद आ जाए तो, आप भी अपने किस्से जरूर साझा करें....
 तो चले, इस रुके हुए पल में सफर की बाते करते हैं.....  






कभी भी ना भूलनेवाला डर का सफर...

       यूँ तो जीवन का हर पल  अनिश्चितताओं से भरा होता है ,कब क्या हो जाएं पता नहीं। वैसे ही जब हम कही यात्रा पर निकलते हैं तो हमें नह...