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गुरुवार, 2 जून 2022

"मुंबई की पहली बारिश"



  कभी-कभी ऐसा भी होता है कि चंद मिनटों का सफर..कई घंटो का हो जाता है,इतना ही नहीं सरल सा रास्ता भी मुश्किलों से भरा हो जाता है,ऐसा ही एक सफर तय किया था मैंने आज ही के दिन "2 जून" को। 

    बात उन दिनों की है जब आज से चार साल पहले मैं पहली बार मुंबई आयी थी। मुझे आए हुए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था। मायानगरी की अदाओं से मैं अभी बिल्कुल अनजान थी, इसके मिजाज के बारे में थोड़ा बहुत सुना पढ़ा तो था मगर अनुभव के नाम पर सब जीरो था। ना रास्तों का ढंग से पता था ना ही बाजार-हाट का, ना ही किसी व्यक्ति विशेष से परिचय था। पहचान के नाम पर हमारी एक बुजुर्ग हाउस ऑनर थी जो मराठी थी ना उनकी कोई बात मेरी समझ में आई ना ही मेरी कोई बात उनके पल्ले पड़ती बस, दुआ सलाम तक ही बातें होती थी।

    एक सप्ताह तो घर की सारी व्यवस्था में ही लग गया। हम माँ-बेटी ही थे कोई सहयोगी भी नहीं था तो हमें बहुत सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा जो कि अक्सर नए शहर में जाने पर होता ही है, इसके लिए हम माँ-बेटी मानसिक रूप से पहले से ही तैयार थे। 15 दिन में हम एडजेस्ट कर गए थे। फिर बेटी काम की तलाश में ऑडिशन देने जाने लगी,साथ में मुझे भी जाना होता क्योंकि नया शहर होने के कारण थोड़ा मैं भी ड़रती थी थोड़ी वो भी झिझकती थी। लेकिन उसके साथ मेरे जाने का  सिलसिला भी जल्दी ही ख़त्म हो गया बहुत जल्द बेटी अकेले आने-जाने लगी। अब समस्या मेरी हो गई क्या करूँ मैं...पुरे दिन घर में अकेली। तो ढूंढ़ते-ढूंढते एक पार्क मिल गया और मुझे इस पार्क का सहारा। मेरा ये ब्लॉग का सफर भी इसी पार्क से शुरू हुआ था। घंटे दो घंटे बैठती थी जो विचार उमड़ते उन्हें मोबाइल में नोट कर लेती, थोड़ा दिल भी बहल जाता और खुली हवा में सांस लेने को भी मिल जाता वरना, मुम्बई के माचिस के डिब्बियों जैसे घर में दम घुटने लगता था।

  रोज तो नहीं मगर जब भी मेरा दिल नहीं लगता, मन उदास हो जाता तो मैं इसी पार्क में आकर बैठ जाती थी । ऐसा ही एक दिन था "2 जुन मेरी शादी की सालगिरह का दिन"। पहली बार आज के दिन घर-परिवार से भी दूर थी और पतिदेव से भी। बेटी का भी उसी दिन एक जरूरी वर्कशॉप का क्लास था उसका जाना जरूरी था वो सुबह 8 बजे ही निकल गई।पुरे दिन की तनहाई और घर का खालीपन मेरे लिए असहनीय हो रहा था। गर्मी बहुत थी तो दिन तो जैसे-तैसे गुजार लिया शाम होते ही मैं पार्क के लिए निकल पड़ी जो घर से महज़ आधे किलोमीटर की दुरी पर ही था। बेटी घर से जाने के बाद बस एक बार दोपहर में कॉल की थी तो बोली कि बस एक घंटे में घर आ जाऊँगी। उसके बाद उसने कोई कॉल नहीं किया मैं जब भी फोन करूँ तो फोन स्विच ऑफ मिलता रहा।  पहली बार वो मुम्बई में घर से इतनी देर बाहर थी।नया शहर और माहौल के कारण दिल में बुरे-बुरे ही ख्याल आ रहें थे।उसका एक दोस्त भी साथ में था उसका फोन भी स्विच ऑफ ही जा रहा था। दोस्त भी कोई बहुत दिनों का परिचित नहीं था सो मन कभी-कभी अनजान शंकाओं से भर जा रहा था। क्या करें "हम बेटियों की मायें कभी अच्छा सोच ही नहीं पाती, हर वक़्त दिल में एक डर जो घेरे रहता है"। 

   खैर, मैं पार्क में बैठी खुद को बहलाने की कोशिश में लगी थी। ऐसे वक्त में अक्सर ऐसा भी होता है कि आप जिसे भी फोन करो वो फोन नहीं उठाता।कभी-कभी ऐसी भी परिस्थिति बनती है जब आप किसी को बात करने के लिए ढुंढते है और आप को कोई भी नहीं मिलता। मेरे साथ भी उस दिन कुछ  ऐसा ही हो रहा था।शाम के  7.30 बज गए, हल्का अँधेरा छा रहा था तभी अचानक से बादल उमड़-घुमड़ के आ गए और तेज हवा चलने लगी। मैं तेज क़दमों से घर के लिए निकल पड़ी सोचा मैं तो घर पहुँचू....क्या पता बेटी घर पहुँच गई हो...उसके फोन की बैटरी ख़त्म हो गई हो...यही सब सोचते-सोचते मैं घर की ओर बढ़ रही थी कि यकायक तेज बौछारों के साथ बारिश शुरू हो गई। अचानक से इतनी तेज बारिश की मैंने कल्पना भी नहीं की थी। फिल्मों में देखती थी कि हीरो-हीरोइन घूम रहें है और अचानक बिजली कड़कने लगी तेज बारिश शुरू हो गई...ऐसा देख हम सब खूब हँसते थे कि-मुम्बईया फिल्मों में हीरो-हीरोइन के मिलते ही अचानक से बारिश कैसे आ जाती है? लेकिन आज ये मेरे साथ सच में हो रहा था, ये अलग बात थी कि-मेरे साथ मेरा हीरो नहीं था।

  खैर,तेज बारिश में भीग तो गई थी मगर तेज हवाओं के साथ गिरती बौछारों से ऐसा लग रहा था कि वो मुझे उड़ा कर ही ले जाएगी तो, खुद को बचाने के लिए मैंने एक छोटे से चर्च के सेड में छुप जाना बेहतर समझा सोची, बारिश थोड़ी देर में तो रुक ही जाएगी फिर चली जाऊँगी। (मुंबई में जगह-जगह छोटे-छोटे ओपन चर्च मिल जाते हैं)लेकिन बारिश थी की रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। मेरा दिल बहुत घबराने लगा ऊपर से बेटी की चिंता और ज्यादा सता रही थी समझ ही नहीं आ रहा था कि किसको फोन करूँ किससे सहायता मांगू। बस,भगवान से गुहार लगा रही थी कि मेरी बेटी जहाँ हो सुरक्षित हो। घर पर भी किसी को फोन नहीं कर सकती थी वो दिल्ली में बैठे क्या करते अलबत्ता घबरा और जाते,सो अपनी पीड़ा अकेले ही सह रही थी। बारिश की बौछार इतनी जबरदस्त थी कि एक घंटे के अंदर पूरा सड़क तालाब बन गया। उन दिनों हम "वर्सोवा गांव"(अंधेरी) के इलाके में रहते थे। उस बस्ती में गंदगी बहुत थी तो बारिश के पानी में कीड़े-मकोड़े तैरने लगे। मैं जहाँ खड़ी थी वहाँ भी जब मेरा पैर एक फीट पानी में डूब गया तो मैंने सोचा अब यहाँ रुकने से बेहतर है मैं इसी पानी में गिरते-पड़ते ही सही घर पहुँचु। अभी सोच ही रही थी कि -फोन की घंटी बजी देखा तो पतिदेव का फोन था फोन उठाते ही उन्होंने कहा  "Happy anniversary" मैं इधर से रुआंसी होकर बोली - "Happy anniversary" बहुत मुश्किल से मैं अपना रोना रोक पा रही थी लेकिन, उन्हें समझ आ गया वो बोले क्यूँ रो रही हो...अगले साल फिर एक साथ होंगे...बहुत तेज़ आवाज़ आ रही है कहाँ हो तुम। (अब उन्हें कौन बताए कि-मेरे रोने की वजह वो नहीं है जो वो सोच रहें हैं ) मैंने झूठ बोला कि-बहुत तेज़ बारिश हो रही है मैं बालकनी में हूँ न इसीलिए आवाज़ आ रही है,कैसे बताती कि मैं फंसी हूँ मुसीबत में। अभी पतिदेव से बात कर ही रही थी कि बेटी का फोन आया मैंने झट फ़ोन ये कहते हुए डिस्कनेक्ट किया कि-बाबू का फोन आ रहा है...बाद में बात करती हूँ। दूसरी तरफ से बेटी की आवाज सुनकर मेरी जान में जान आयी। उसने कहा-मम्मा मैं बिलकुल ठीक हूँ... घबराना नहीं मैं बारिश में फंसी हूँ...कोई ऑटो भी नहीं मिल रहा है....घर आकर सारी बात बताऊँगी...तुम परेशान नहीं होना...तुम कहाँ हो .....?? मैंने उसे भी वही  जबाब दिया जो पतिदेव को दिया था। अगर बता देती तो अब बेटी मेरे लिए घबरा जाती। 

  खैर,जैसे-तैसे,गिरते-पड़ते मैं घर पहुँची। उस पानी भरे नालीनुमा सड़क पर मरे हुए चूहों से लेकर,मछलियाँ, कीड़े-मकोड़े सब तैर रहे थे मैंने किसी पर ध्यान नहीं दिया...लक्ष्य एक ही था बस,कैसे भी घर पहुँच जाऊँ। ऐसा नहीं था कि-उस सड़क पर मैं ही अकेली चल रही थी मेरे साथ बहुत से लोग चल रहें थे मगर,वो मुंबई के इस हालात के आदी थे उन्हें कोई खास फर्क ही नहीं पड़ रहा था और मेरे लिए तो वो "बैतरणी" थी जिसे पार करना  एक चुनौती। 7.30 की पार्क से निकली 10.00 pm में घर पहुँची। ताला खोल ही रही हूँ कि पीछे से बेटी और उसका दोस्त दोनों आ गए,मेरी ऐसी हालत देख वो अचम्भित हो पूछी -ये क्या हाल हो गया है..कहाँ थी तुम ? मैंने कहा-"अभी कुछ ना पूछो...सैकड़ो कीड़े मेरे जिस्म पर चल रहे हैं...पहले उन्हें हटा लेने दो"। ताला खोलते ही मैं सीधी बाथरूम में भागी। बेटी भी पूरी तरह भीगी हुई थी मेरे बाद वो भी पहले नहाने ही गई। नहाने के बाद मैंने कॉफी बनाई क्योंकि बारिश में उतना भीगने के बाद कंपकपी सी हो रही थी। तब तक उसका दोस्त भी नहाकर आ गया हम तीनों कॉफी पीते-पीते अपनी अपनी आपबीती सुनाने लगे।

   बेटी ने बताया कि-क्लास तो तीन बजे तक ही था लेकिन जैसे ही क्लास खत्म हुआ थियेटर जगत के एक बड़े एक्टर आ गए, ऑर्गनाइजर ने कहा कि-आप यदि इनका वर्कशॉप अटेण्ड करना चाहे तो कर सकते हैं। कोई चार्ज तो था नहीं सो हम बहुत ज्यादा ही खुश हो गए और क्लास  में चले गए उन लोगो ने हमारा फोन स्विच ऑफ करवाकर पर्स बाहर ही जमा करवा दिया, अत्यधिक उत्साह में हम दोनों आपको बताना ही भूल गए और एक बार अंदर चले गए तो बाहर नहीं आ सकते थे। बेटी का दोस्त जिसका नाम अंकित था उसने मुझे संतावना देते हुए कहा-"आंटी क्यूँ घबरा जाती हो....दामिनी मेरी बहन जैसी है...मैं जब इसके साथ रहूँ तो आप बेफिक्र रहो करो....आपकी बेटी को कही अकेला नहीं छोड़ूँगा"। उसकी  ये बातें सुन मैंने उसे गले लगा लिया आज भी वो मेरी बेटी का भाई ही है,अब तो वो मुंबई में नहीं रहता मगर रिश्ता नहीं तोडा है। मैं सोचती हूँ कि-आज के खराब माहौल में हम अच्छे लोगों पर भी शक करने लगते हैं,लेकिन जब तक किसी के साथ वक़्त नहीं बिताओं कैसे पता चलेगा कि-कौन अच्छा,कौन बुरा। 

   खैर,उसे जब पता चला कि आज मेरी शादी की सालगिरह है तो उसने भी मुझे विश किया। घर में ज्यादा कुछ तो था नहीं तो बस,पूरी और आलू की सब्जी बनाई और तीनो साथ बैठकर खाना खाये। ये सब करते-करते रात के एक बज गए थे। पतिदेव से दुबारा बात भी नहीं हुई। बस,ऐसे ही मनाया मैंने "मुंबई की पहली बारिश में अपनी शादी की सालगिरह"। रात को बिस्तर पर लेटे-लेटे मैं सोच रही थी कि-माँ ठीक ही कहा करती थी "सफर छोटा हो या बड़ा उसका रास्ता अनिश्चित ही होता है"। आज शाम 6 बजे जब मैं घर से निकली थी तो आसमान बिल्कुल साफ़ था मैंने कल्पना भी नहीं किया था कि-मेरा ये छोटा सा टहलने जाने वाला सफर भी इतना "Adventures" हो जायेगा। 

सच,"ना जिंदगी का पता है ना सफर का" सब कुछ अनिश्चित। 

बुधवार, 2 जून 2021

"सच्चे हमसफ़र..... "

   


    बात उन दिनों की है जब मेरी शादी को बस दो साल हुआ था ,मेरी गोद में 9-10 महीने की बेटी थी जिसकी तबियत बहुत ज्यादा खराब थी और उसे ही डॉक्टर से दिखाने के लिए हम बीरगंज (नेपाल, जहाँ मैं व्याह कर गई थी ) से मोतिहारी  (पश्चिमी चम्पारण,बिहार  जहाँ मेरे माँ-पापा रहते थे ) जा रहें थे। नेपाल बॉर्डर पार कर रक्सौल पूर्वी चम्पारण से हमें ट्रेन पकड़ना होता था। जब हम रक्सौल पहुंचे तो देर हो गई थी और ट्रेन खुलने ही वाली थी (बॉर्डर पार अक्सर जाम होता था,कभी-कभी कई-कई घंटे लग जाते थे,उस दिन भी कुछ ज्यादा ही जाम था ) हम भागते-भागते ट्रेन में चढ़ गए मगर टिकट नहीं लिए थे ,तभी किसी कारण से ट्रेन थोड़ी देर रुक गई ,मेरे पतिदेव ने मेरी एक ना सुनी और वो टिकट लेने के लिए  ट्रेन  से उतर गए। टिकट काउण्टर पर भी लम्बी लाईन लगी थी। पतिदेव के जाने के दो मिनट बाद ही ट्रेन चल पड़ी। खिड़की से झाँकते हुए मेरी नज़र बेसब्र हो उन्हें ढूँढने लगी लेकिन दूर-दूर तक वो दिखाई नहीं दे रहें थे। ट्रेन  खुलते के साथ ही मेरी बेटी जोर-जोर से पापा-पापा  चिल्लाते  हुए रोने लगी ,वो  खिड़की से दोनों हाथ बाहर कर तड़प-तड़प कर रो रही थी। मैं उसे संभालने लगी तभी प्लेटफॉर्म पर शोर हुआ "अरे ,कोई आदमी ट्रेन से गिर गया "शोर सुनते ही सब खिड़की-दरवाजे से बाहर लटकते हुए झाँकने लगे,मैं अपनी सीट पर बैठी, बेटी को कसकर पकडे हुए ये प्रार्थना करने लगी "प्रभु वो आदमी जो भी हो उसकी रक्षा करना, उसे अपने परिवार वालों तक सही सलामत पहुँचा देना " प्रार्थना करते-करते मेरी आँखों से आँसू बहने लगे,मेरी बेटी जब पांच छह महीने की थी तभी से वो मेरी आँखों में आँसू नहीं देख पाती थी मेरी आँखों में आँसू देखते ही वो रोना भूलकर मेरे आँसू पोछने लगती थी (अब इतनी छोटी बच्ची ऐसा क्यूँ करती थी वो तो परमात्मा ही जाने ) उस दिन भी वही हुआ वो रोना भूल मेरे आँसू पोछने लगी। गाडी रफ्तार पकड़ चुकी थी ,एक उम्मींद थी कि पतिदेव शायद किसी और कम्पार्टमेंट में चढ़ गए होंगे परन्तु इस बात की पुष्टि तो अब अगले स्टेशन पर ही होगी। 

    सच ही कहते हैं "अकेली औरत खुली तिजोरी की तरह होती है " उसे देखते ही चारो तरफ से लुटेरे आ धमकते हैं, मेरे साथ भी वही हुआ। मेरे बहुत से शुभचिंतक मेरे इर्द-गिर्द खड़े हो गए "कहाँ जाना है मैडम....पतिदेव छूट गए क्या......हमें बताइए हम आपको छोड़ देंगे.....आप बिलकुल ना घबराइए मैं हूँ न " ऐसे-ऐसे जुमले चारों तरफ से मेरे कानों में पड़ने लगे। कोई मेरी बेटी को पुचकार रहा है तो  कोई टॉफी दे रहा है। मेरी बेटी हर एक का हाथ झटक दे रही थी। बेटी की इस हरकत को देखते ही मेरे अंदर का डर (जो सिर्फ इस वजह से था कि -कही इनके साथ कुछ बुरा न हुआ हो,अन्यथा डरना तो मैंने सीखा ही नहीं, ना तब ना अब ) गायब हो गया, मैं खुद को संभालते हुए बोली -" आप लोगो चिंता ना करे......मैं अकेली ही जाने वाली थी.....पतिदेव तो सिर्फ बैठाने आये थे... हाँ,टिकट उनके पास रह गया है....मगर मेरे पास पैसे है....आप लोगो को परेशान होने की जरूरत नहीं है।" मेरे सब कुछ कहने के वावजूद.....कुछ कुत्ते ढीढ होते है न....मांस का टुकड़ा आसानी से अपने हाथो से जाने नहीं देना चाहते... वो बातचीत करने का सिलसिला जारी रखे थे, पर मैं भी ऐसे कुत्तों से डरने वाली तो थी नहीं, मैं भी आराम से उनके सवालों का जबाब दे रही थी। कहाँ तक जाना है मैडम ....ज्यादा दूर नहीं बस मोतिहारी जाना है। अच्छा, मैं भी मोतिहारी ही उतरुँगा....कोई दिक्क्त नहीं आप मेरे साथ हो लेना ---हाँ-हाँ जरूर,आप तो भले आदमी लग रहें है। दूसरी आवाज आई---अरे मैडम,मोतिहारी में किसके घर जाना है.....मैं सबको जनता हूँ---इस सवाल पर मैंने थोड़ी समझदारी दिखाई और अपने पापा का नाम ना लेकर बोली- अरे भाईसाहब, मुझे छेदी प्रसाद के घर जाना है.... मैं उनकी भतीजी हूँ.....आप तो मेरे चाचा को अच्छे से जानते होंगे न....मोतिहारी में ऐसा कोई नहीं जो उन्हें ना जाने....आप मुझे घर पहुंचा दीजियेगा.....चाचा बहुत खुश होंगे आपसे शायद, ईनाम भी देदे आपको। छेदी प्रसाद का नाम सुनते ही सबके तोते उड़ गए,कोई दबी हुई आवाज में तो कोई मुस्कुरा कर बोलने लगा -अच्छा तो आप छेदी प्रसाद की भतीजी है,एक जनाब तो गले को साफ करते हुए निकल लिये। एक-एक करके सब गदहे की सींग की तरह गायब होने लगे। छेदी प्रसाद हमारे पडोसी थे जो मोतिहारी में " दबंग " के नाम से जाने जाते थे। हमारे घर से उनका बहुत ही अच्छा रिश्ता था और अब भी है। मेरे माँ-पापा थे ही ऐसे जो खुद तो बड़े सीधे थे मगर बनती उनकी सबसे थी,सब पापा की बहुत इज्जत करते थे।

     अगले स्टेशन पर भी पतिदेव नहीं आये मुझे समझ आ गया कि -ये सफर मुझे अकेले ही तय करना है। ख़ैर, छेदी प्रसाद का नाम सुनते ही चील-कौओं का मड़राना तो बंद हो गया मगर मेरी फ़िक्र और परेशानी कैसे कम होती, मेरी  गोद में एक बच्ची,एक हैंडबैग और एक सूटकेस  ये सब लेकर मैं स्टेशन पर उतरूंगी कैसे,  गाड़ी भी बस दो  मिनट रूकती है। कहते हैं न जहाँ बुरे लोग है वहाँ अच्छो की भी कमी नहीं,स्टेशन आने पर एक भलामानस जो शुरू से ये सब देख रहा था मगर चुप था उसने हाथ बढ़ते हुए कहा " May I help you "मैंने भी स्वीकृति में सर हिला दिया। उसे भी वही उतरना था तो ज्यादा परेशानी  नहीं हुई,मेरे कहने पर वो मेरे सामान को प्लेटफॉर्म की दूसरी ओर रेलवे लाईन पार करते ही जहाँ मेरे पापा का ऑफिस था वहाँ तक पंहुचा दिया। मैंने उसे थैंक्स कहा और वो भी बड़े ही शालीनता के साथ हाथ जोड़कर चला गया। पापा के ऑफिस पहुँचकर मुझे चैन मिला,अब घर पहुँचने की फ़िक्र नहीं बस, इनकी चिंता हो रही थी। जब से सुना था कि -ट्रेन से कोई गिर गया है अंदर तक एक घबड़ाहट झकझोर रहा था,दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था जैसे मुँह को आ जायेगा,बस ऊपर-ऊपर से तो सहज बनी रही और हर पल भगवान से प्रार्थना करती रही "वो बिल्कुल ठीक होंगे"। मेरे ट्रेन के तीन  घंटे बाद एक ट्रेन  थी, मुझे यकीन था वो उसी ट्रेन से तीन घंटे बाद मुझ तक जरूर पहुँचेगे। 

    खैर,अभी की परिस्थिति पर पहले फोकस करना था--ये सोच मैं पापा के ऑफिस में गई,अंदर जाने पर पता चला कि -पापा तो ऑफिस आये ही नहीं ,वो तो एक सप्ताह से ऑफिस नहीं आ रहें हैं। इतना सुनते ही मेरे पैरों के नीचे से जमीन निकल गई---ऐसा कैसे हो सकता है---क्या हुआ होगा पापा को---क्यूँ छुट्टी लिए है ? ऐसे कई सवालों ने मुझे घेर लिया। उस दिन ऑफिस में मुझे एक भी पहचान के लोग नहीं मिले जिनके साथ मैं घर तक  जाती और अंजानो का साथ मैं लेना नहीं चाह रही थी। उस शहर की सबसे बड़ी खराबी थी वहां जल्दी रिक्सा नहीं मिलता था,घर तो लगभग एक किलोमीटर से भी कम की दुरी पर था मगर उतना दूर भी सामान और बच्चें को लेकर मैं कैसे चल पाऊँगी। वैसे भी बेटी के होने के बाद से मैं बहुत कमजोर हो गई थी, चलने पर ही साँस फूलती थी,ऊपर से बेटी सीजीरियन हुई थी तो भारी समान लेकर चलना और मुश्किल था, मेरी बेटी का वजन भी तो  10 किलो था, मेरे तो पसीने छूटने लगे। मगर करती क्या,आज के जमाने की तरह मोबाईल तो था नही कि -एक बटन दबाओं और सारी समस्याओं का समाधान हो जाए। मेरे पास विकल्प तो था नही सो "चल अकेला "कहते हुए इस उम्मींद पर चल पड़ी कि -रास्ते में कोई तो पहचान का मिल जाएगा लेकिन,  उस दिन मेरी किस्मत शायद बहुत खराब थी, कोई नहीं मिला। 

     अब उस दिन, मेरी किस्मत बहुत खराब थी या बहुत अच्छी वो तो सफर ख़त्म होने के बाद ही पता चलता। खैर, रुक-रुककर,दम भरते हुए मैं किसी तरह घर पहुँची। सामान नीचे रखकर दरवाजा खटखटाने ही वाली थी कि -देख रही हूँ " दरवाजे पर बड़ा सा ताला लटका " अब तो मेरी क्या दशा हुई होगी ये बताने की जरूरत नहीं। दूसरा कोई रास्ता नही था तो उसी छेदी प्रसाद चाचा के घर का दरवाजा खटखटाया मैंने। चाची ने दरवाजा खोला -मुझे ऐसे हालत में देखते ही वो घबरा गयी,मुझे पकड़कर रोती हुई बोली -"क्या हुआ बेटा,तुम ऐसे हालत में ?"  आप समझ सकते हैं उस ज़माने में बेटियाँ,  बच्चें और सामान के साथ अकेले दरवाजे पर आ खड़ी हो तो क्या गुजरती थी सब पर, असंख्य शंकाये उन्हें घेर लेती थी। मैं रोती उससे पहले चाची ही दहाड़े मारकर रोने लगी। उनका रोना सुन भाभी बाहर आई (छेदी प्रसाद की बहु )वो चाची को मुझसे अलगकर मुझे अंदर लेकर गई....मेरी साँस चढ़ी हुई थी...उन्हेने मुझे पानी पिलाया....बेटी को गोद से लेकर उसे भी बिस्कुट दिया। (जैसा कि -मैंने पहले ही बताया है कि उनके घर से हमारे अच्छे संबध थे,उनकी बेटी नहीं थी तो वो लोगो मुझे संगी बेटी जैसा ही स्नेह देते थे )चाचा भी आ गए आते  सवाल-मेहमान कहाँ है ?

     मुझे जब थोड़ी साँस आई तो मैंने उन्हें सारा वृतांत सुनाया और उन्होंने बताया कि -मेरे नानाजी का देहांत हो गया है और मेरा सारा परिवार वही गया है। उन दिनों घर में फोन तो था नही और नेपाल में भी फोन करने की सुविधा नहीं थी। हाँ,इस  घटना के बाद  मेरे पापा ने घर में फोन लगवा लिया। अब मेरे पतिदेव का क्या हुआ ये जानने के लिए तीन घंटे इंतज़ार करने थे। अब तक तो खुद ही उलझी थी लेकिन अब एक-एक पल सालों के जैसे गुजर रहा था। मैं आज भी शुक्रगुजार हूँ भाभी की जिन्होंने मुझे बड़े प्यार से संभाला। मेरी बेटी  पापा-पापा कहकर सिसकती रही थी,रोने के कारण उसका बुखार और बढ़ता जा रहा था। खैर,8 बजे रात में दूसरी ट्रेन  का टाईम था, 7. 30 में ही भईया (चाचा के बेटे )मेरे पतिदेव को लेने के लिए स्टेशन चले गए। 8. 30 में जब वो वापस आये तो उनके साथ कोई ना था,वो बताए कि -पूरा स्टेशन ढूढ़ लिया मेहमान कही नही मिले,इतना सुनते ही चाची और रोने लगी,चाचा उन्हें समझाने लगे -हो सकता है दूसरी ट्रेन से आये---लेकिन सब जानते थे कि -उसके बाद सुबह तक कोई ट्रेन नही है.मैं अपनी आँसू को छुपाये  बेटी को सभालते हुए खुद को समान्य रखने की कोशिश कर रही थी और मन  ही मन बस प्रार्थना.......... बाहर के बरामदे में सभी  बैठे थे... सब खामोश---तभी छोटा अंकुर चिल्लाता हुआ आया  "फूफाजी आ गए " सब एक साथ दौड़ पड़ें,सबने उन्हें घेर लिया मेरा दिल कर रहा था कि -मैं भी दौड़कर उनसे जाकर लिपट जाऊँ-- मगर उस वक़्त के हमारे संस्कारों ने पैरों में बेड़ियों डाल रखी थी, भाभी मुझे कसकर पकड़कर खड़ी थी और मैं उनके छाती से लगकर फफक कर रो पड़ी,दुःख के आँसू को तो रोक लिया था ख़ुशी के आँसू झलक पड़े। उनकी एक झलक भी नहीं देख  पाई मैं---क्योंकि सब उन्हें घेरे थे। मैं अंदर दरवाजे से लगकर खड़ी थी वो जैसे ही बरामदे में चढ़े मेरी और उनकी निगाहे एक हो गई और दोनों के आँखें  बरस पड़ी । उनके कपडे जगह-जगह से फट्टे थे और गंदगी लगी थी,सर पर पट्टी बंधी थी हाथ-पैरो पर भी गहरे चोट लगे  जख्म दिख रहे थे ,मुझे समझते  देर लगी कि -"ये वही थे जिसके लिए मैंने दुआ की थी "

    हमें रात चाचा के घर ही गुजारनी पड़ी ,रात क्या दो दिन रहना पड़ा जबतक माँ-पापा नहीं आये। वो रात भुलाये नहीं भूलती...बेटी को निमोनिया था वो पूरी रात बुखार में तप रही थी उसे साँस लेने में दिक्क्त होती और पतिदेव को भी अंदुरनी चोट और डर की वजह से बुखार हो गया था। कमरे में आते ही वो मुझे पकड़कर ये कहते हुए फफक-फफक कर रो पड़ें --"आज तो एक पल को लगा जैसे मैं तुमसे हमेशा-हमेशा के लिए बिछड़ गया,मेरा अंत समय स्पष्ट दिख रहा था,यकीनन तुम्हारा  नेक कर्म होगा जिसने मुझे मौत के मुख से निकल लिया। " उसके बाद जो उन्होंने सुनाया उसे यादकर आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि -मैं ट्रेन पकड़ चुका था ,एक हाथ से मैं ट्रेन का दरवाजा पकडे था और मेरा दूसरा हाथ  एक आदमी ने पकड़ रखा था और अंदर खींचने की कोशिश ही कर रहा था तभी diversion पर (जहां ट्रैन पटरी बदलता है ) बहुत तेज झटका लगा और मेरा हाथ  छूट गया और मैं दूर दूसरी पटरी पर फेका गया, गहरी चोट के कारण मुझे बेहोशी सी आ गई थी,मैं उठ नहीं पा रहा था और उस पटरी पर (जिस पर वो गिरे थे )एक मालगाड़ी आ रहा था लेकिन,तभी किसी ने मुझे किनारे की ओर खींच लिया,वही  आदमी मुझे सहारा देकर स्टेशन पर लाया,मुझे पानी पिलाया मेरे जख्मों को भी धोया और पास के मेडिकल स्टोर ले जाकर मेरी मरहम-पट्टी करवाई,तब मैं तुम तक पहुंच पाया हूँ। इतना कहते-कहते वो मुझसे लिपटकर फिर रो पड़ें। 

   सारी रात वो डर-डरकर मेरा साथ पकड़ लेते और मैं पूरी रात कभी बेटी के सर पर ठंडे पानी की पट्टी रखती कभी इनके सर पर। मुझे होमियोपैथ का जितना ज्ञान था और उस वक़्त मेरे पास जितनी दवाईयां थी उससे रात भर दोनों का इलाज करती रही। परमात्मा ने मेरी सुनी और मेरी अगली सुबह रौशनी से भरपूर थी--दोनों का बुखार उतर चूका था,दोनों पापा-बेटी एक दूसरे को गले लगाया चैन से सो रहे थे। सुबह चाय-नाश्ता के बाद हम डॉक्टर के पास दोनों को लेकर गए,क्योंकि दोनों का चैकअप करवाना जरूरी था। चाची और भाभी ने मेरा इतना ख्याल रखा कि-आज तक मैं उनकी एहसानमन्द हूँ। 

    आज इस घटना को तेईस साल हो गए। उस तीन घंटे में हम दोनों ने यही महसूस किया था कि -शायद अब हम एक दूसरे से कभी नहीं मिल पाएंगे,वो तीन घंटे तीन साल की तरह गुजरा था हम पर। मगर ---आज मैं सोचती  हूँ कि -"उस तीन घंटे में हम दोनों एक दूसरे से दूर जा रहे थे या और करीब आ रहें थे ?"

    अरेंज मैरिज की एक खास बात होती है "यहाँ हम एक दूसरे से बिलकुल अनभिज्ञ होते।एक दूसरे से प्यार होने की बात तो दूर एक दूसरे को ठीक से देखे तक नहीं होते हैं और ऐसे में एक दिन हमें एक डोर में बांध दिया जाता है और आज्ञा दी जाती है कि -तुम्हे साथ रहना भी है और निभाना भी। हमारे समय में ऐसी स्थिति में कोई विकल्प नहीं होता था तो पहले ही दिन से मानसिकता ही यही होती थी " तन-मन समर्पण की " तो आधी समस्या यही सुलझ जाती थी। मगर आधी का क्या ? आधी में होता ये है कि -सिर्फ एक दूसरे से अपेक्षा ही रखी गई और अपना-अपना  कर्तव्य नहीं निभाया गया तो जीवन कलह-क्लेश से भर जाता है और यदि छोटे-छोटे मासूम से ख़ुशी और दुःख के पल को संजोया गया और उन पलों में आपसी मतभेद ना कर सीख ले लिया गया तो वही पल एक दूसरे को करीब और करीब लाते जाते हैं। 

    उस दिन के तीन घंटे ने हमें एक दूसरे का मोल समझा दिया था। हमारे रिश्तें में यही होता था जीवन में आये ऐसे पलों ने हमें बहुत कुछ सिखाया और हम एक दूसरे के करीब और करीब आते चले गए...हमनें कभी एक दूसरे पर दोषारोपण नहीं किया ....सफर में जब भी मैं गिरी तो उन्होंने संभाला....वो गिरे तो मैंने अपनी बाँहों का सहारा दिया और जीवन सफर अनवरंत आगे बढ़ता रहा..."25 सावन " कब गुजर गया पता ही नहीं चला.....बस,बालों की सफेदी वक़्त का एहसास करा रही है । हमारे लिए तन की दुरी ने कभी मायने नहीं रखा....आज भी मैं उनसे बहुत दूर हूँ तकरीबन 1415 किलोमीटर दूर मगर सिर्फ तन से मन हरपल एक दूसरे के पास है और हमेशा पास ही रहेंगे। आज ही के दिन वो मेरे "हमसफ़र" बने थे, अब परमात्मा ने कब तक का साथ लिखा है नहीं जानती मगर जब तक जिन्दा है एक दूसरे के सच्चे हमसफ़र थे और रहेंगे..... 

सोमवार, 10 मई 2021

डेस्टिनेशन "अंतिम लक्ष्य "

 


"डेस्टिनेशन अर्थात  गंतव्य ,आखिरी पड़ाव या अंतिम लक्ष्य" 

     जब भी कोई सफर शुरू हुआ है तो वो कही ना कही जाकर खत्म जरूर होता है। अब  सफर सुखद हो या दुखद उसका अंत होना निश्चित है। आपको अपनी मंजिल मिली या नहीं आप सही गंतव्य पर पहुंचे या नहीं, ये निर्भर करता है आप की सफर के शुरुआत पर। आप जब ट्रेन सही पकड़ेंगे तो वो निश्चित रूप से आपको आपके सही गंतव्य पर छोड़ेगी ही।ज़िंदगी भी तो एक सफर ही है.... 

एक गीत के बोल है -

"ज़िंदगी का सफर है ये कैसा सफर

कोई समझा नहीं,कोई जाना नहीं ,

है ये ऐसी डगर,चलते हैं सब मगर 

कोई समझा नहीं,कोई जाना नहीं "

क्या सचमुच हम नहीं जानते,नहीं समझते या समझना ही नहीं चाहते ?

ज़िंदगी का सफर हो या ट्रेन का, एक ही नियम में चलती है। सोच-समझकर...अपने "अंतिम लक्ष्य" का  सही निर्णय कर....रास्ते की पूर्ण जानकारी लेकर....साथ में चल रहे सहयात्रियों के साथ ताल-मेल बिठाकर....सफर में आने वाले विघ्न-बाधाओं के लिए भी खुद को पहले से तैयार कर....जब सफर की शुरुआत करते हैं तो सुखद मंज़िल मिलनी        तय है। कभी-कभी सफर में अनहोनियाँ भी हो जाती है जिसका अंदाज़ा भी आप नहीं लगा सकते हैं                   उस परिस्थिति में भी खुद को सयंमित रखना भी नितांत आवश्यक होता है। 

ट्रेन के सफर के आखिरी पड़ाव को हम जानते हैं,उसके मुताबिक सहजता से पूर्व तैयारी कर रखी होती है हमने, अधिकांश लोग होनी-अनहोनी के लिए भी खुद को तैयार रखते हैं मगर ज़िंदगी का सफ़र.....जिसका आखिरी पड़ाव  "मौत" है उसके विषय में जानते सब है,समझते भी सब है परन्तु कभी भी पूर्व तैयारी करके नहीं रखते। 

क्यों ? क्योंकि "समय अवधि" का पता नहीं होता। हमें लगता है अरे ! अभी स्टेशन आने में काफी देर है और मरने की क्या तैयारी करना ? जब मौत आएगी तो चल पड़ेंगे उसके संग....कौन सा उसके लिए बोरियां-बिस्तर बांधना है ?

मगर दोस्तों,असली सफर तो यही है,इसकी तो तैयारी ज्यादा करनी होती है। क्योंकि ये सफर तो जन्म लेने के साथ ही शुरू हो जाता है और जैसे-जैसे सफर आगे बढ़ता है हमारी  मंज़िल तो पहले से तय होती है मगर....सफर सुखद होगा या दुखद ये हमारे खुद के जीवन शैली पर,सहयात्रियों के साथ हमारे व्यवहार पर,सफर के दौरान आई बिघ्न-बाधा के वक़्त  लिये गए सही-गलत निर्णय पर निर्भर करता है। ट्रेन-बस या किसी भी बाहन की यात्रा के दौरान यदि दुर्घटना होती है तो हम कहते हैं कि -यात्रा की  लगाम तो किसी और के हाथों में होता है उस पर हमारा नियंत्रण नहीं होता न ,मगर जीवन-यात्रा की पूरी लगाम तो हमारे हाथों में होती है। आज का हमारा कर्मा या कार्य कह लें वही हमारा कल निश्चित रूप से तय करता है। फिर भी सबसे ज्यादा कोताही या लापरवाही या गैर-जिम्मेदाराना हरकत हम इसी यात्रा में करते हैं। 

यात्रा कोई भी हो हमारा काम खुद संभल कर चलना नहीं होता हमारा काम होता है अपने सर आयी परेशानी का ठीकरा किसी और के सर फोड़ना। वाहन में दुर्घटना हुई तो ड्राईवर खराब था जीवन में दुर्घटना हुई तो सरकार गलत है या उससे भी बेहतर विकल्प भगवान का किया धरा है "हम क्या कर सकते हैं हम तो इनकी हाथो की कठपुतली है।" क्या  हम सचमुच  किसी के हाथों की कठपुतली है ? हम किसी के हाथों की कठपुतली नहीं है....       ना ही हो सकते हैं....हमें कोई नहीं नचा सकता.... हमारा नाचना हम स्वयं तय करते हैं। 

किसी शायर ने कहा है -

"मौत आनी है आएगी एक दिन,जान जानी है जायेगी एक दिन 

ऐसी बातों से क्या घबड़ाना,यहाँ कल क्या हो किसने जाना "

अच्छी लगती है ये पंक्तियाँ और 21 वी सदी के लोगो ने इसे अपना भी लिया। कल क्या होना है इस पर अपना जोर तो है नहीं तो आज जी लो जी भर के,मौज-मस्ती करो कल की फ़िक्र छोड़ो। 

जी लो यार, किसने रोका है मौत आएगी तो चल देना साथ मगर कम से कम ये तो तय कर लो कि - कुत्तों की मौत मरोगे या इंसानों की ?

अब यहाँ फिर ये सवाल -क्या फर्क पड़ता है मौत तो मौत है इसमें क्या च्वॉइस करना,कोई कपड़ा या खाना तो नहीं जिसके पसंद से मज़े में फर्क पड़ जाएगा ?

फ़र्क पड़ता है दोस्त ,यदि नहीं पड़ता तो आज हम अपने अपनों को चंद साँसों के लिए तड़प-तड़पकर मरते देख खुद भी ना तड़प रहे होते,उनकी अर्थियों को कन्धा ना दे पाने का मलाल नहीं होता, उनके शरीर को गैरो के हाथों या मशीन में जलते देखना इतना दुस्कर ना होता। एक बार फिर से ये सोच, क्या फर्क पड़ता है- मौत आयी मरने वाला मर गया.....अब मरने के बाद लाश को हॉस्पिटल वाले जलाये या म्युनिसिपल्टी वाले या कोई फर्क नहीं....है न ?

क्या सचमुच फ़र्क नहीं पड़ता है ?

हिन्दू मान्यता में "आत्मा" जैसी किसी चीज का जिक्र होता है। कहते हैं शरीर मरता है आत्मा अमर होती है।वैसे बहुत से हिन्दू विरोधी तत्व इसे अपने तर्क-वितर्क से सिरे से ख़ारिज करते हैं और कहते हैं  कि-ये ढकोसला है (कुछ लोग तो हिन्दू धर्म और संस्कार को राजनिक रूप भी दे देते है ) मगर हमने देखा है वही लोग सबसे ज्यादा ढकोसला बाजी करते हैं। खैर,वैसे मॉडन साइंस ने भी अब ये कहते हुए इसके आस्तित्व को स्वीकार लिया है कि -कुछ ज्योतिपुंज जैसी चीज तो होती है जिसके निकलते ही शरीर मर जाता है।आत्माओं के भटकने या बिना शरीर के उसके होने की बात भी अब वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध हो चुकी है।  

क्या सचमुच आत्मा होती है  ?

   होती तो है,ये शब्द बे-माने तो नहीं। गाहे-बगाहे हमने ये कहते सुना ही होगा और बोलते भी होंगे "मेरी अंतरात्मा पर बोझ है,मेरी अंतरात्मा तड़प रही है"क्यों कहते हैं हम ऐसा ? यकीनन आत्मा का मतलब "मन" है और सफर शरीर नहीं करता आत्मा करती है। तभी तो मन के थकने से शरीर थकता है मन के हारने से शरीर हारता है। शरीर तो बस आत्मरूपी मन का पोषक है और आत्मा का सफर अनंतकाल से चल रहा है और अनंतकाल तक चलेगा। अंतिम पड़ाव कहा होगा पता नहीं। लेकिन एक सफर से दूसरे सफर तक हम जिस पोषक में यात्रा करते हैं और  जिस गंतत्व तक हमें पहुंचना होता है  फ़िलहाल वही हमारा "आखिरी लक्ष्य" होता है।मगर इस  "आखिरी लक्ष्य" के बारे में हमने कभी सोचा  ही नहीं जो सबसे जरूरी था। 

ये जीवन सफर इतना मुश्किल पहले कभी नहीं था जितना आज हमने बना दिया है,सचमुच नहीं पता अगले पल क्या होने वाला है। क्योंकि यात्रा के दौरान हम राहों में जो गंदगी फैलाते आये है,सहयात्रियों से मुख मोड़ते आये हैं ,नियम-कानून तोड़ते आये हैं  ,सीधे शब्दों में जो अपने संस्कार छोड़ते आये हैं  उसका खामियाज़ा तो भुगतना ही पड़ेगा और भुगत ही रहें है तभी तो  श्मसान घाट तक भी अकेले जा रहे हैं  और आज की मौत तो हमें खुद की लाश को भी खुद के कंधे पर ढोने पर भी मजबूर कर रखा है। फिर वही बात -

"जब जागो तभी सवेरा"

 अब भी हम यदि सोते-सोते ही सफर काटेंगे तो "डेस्टिनेशन" पर तो पहुंच ही जायेगे क्योंकि वहाँ पहुंचना तय है मगर आत्मा पर इतना दर्द और बोझ लेकर जायेगे कि -हमारा अगला सफर इससे भी डरावना होगा। 

"मुंबई की पहली बारिश"

  कभी-कभी ऐसा भी होता है कि चंद मिनटों का सफर..कई घंटो का हो जाता है,इतना ही नहीं सरल सा रास्ता भी मुश्किलों से भरा हो जाता है,ऐसा ही एक सफर...