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बुधवार, 14 अक्तूबर 2020

अँधा प्यार,अंधी भक्ति

   


  हमारी आदत होती है कला से कम और कलाकारों से ज्यादा जुड़नें की,खेल को कम खिलाड़ियों को ज्यादा महत्व देने की,भगवान की भक्ति कम मगर ढोंगी बाबाओं की भक्ति ज्यादा करने की। पता नहीं ये कैसी इंसानी प्रकृति है कि-हम किसी के इतने मुरीद हो जाते हैं  कि आँखे मूँदकर उन्हें सर पर बिठा लेते हैं। कभी-कभी तो जान लेने और देने तक को उतारू हो जाते हैं और हम जिन्हें  सर-आँखों पर बिठाकर अंधी भक्ति कर रहें होते हैं उन्हें ना तो हमारी कदर होती है ना परवाह,वो तो हम से पूरी तरह बेखबर रहते हैं। 

   चाहे वो कला की दुनिया के चमकते सितारे हो या धरती पर भगवान बन बैठे बाबा लोग,इन सभी के कारण आज  जिस तरह से सारे कद्रदानों के दिल टूट रहें हैं,ये दृश्य एक बार सोचने पर मजबूर कर देता है कि -"क्या हम सचमुच विवेकशील है।" हम क्यूँ नहीं समझतें कि ये सब भी हमारे जैसे ही हाड-मांस के पुतले इंसान ही है भगवान नहीं। उन के भीतर भी आम इंसानों की तरह ही छल-प्रपंच,ईर्ष्या-द्वेष,लालच-क्रोध,आशा-निराशा जैसे ही भाव है। वो हम से अलग नहीं है और ना ही वो हीरो और भगवान कहलाने के लायक है। 

   आज देश का जो माहौल बना है ये देखकर मुझे अपनी वर्षो पुरानी एक यात्रा-वृतांत याद आ गई। बात उन दिनों की है जब मैं 12 वी कक्षा में थी। मैं अपने पापा,दादा जी और दो बुआ (पापा की बहनें)के साथ ट्रेन में सफर कर रही थी। उन दिनों ट्रेन के सफर में एक वाद-विवाद का माहौल बन ही जाता था। कभी तो वो विवाद शांतिपूर्ण और एक स्वच्छ चर्चा-परिचर्चा भर होकर रह जाती और कभी तो युद्ध सा माहौल बन जाता "हम किसी से कम नहीं" वाली सोच लगभग हर किसी की होती थी (और है भी)। उस सफर के दौरान भी एक बहस छिड़ गई,विषय था "फ़िल्मी सितारे" मुख्य किरदार थे गुजरे जमाने के सुपरस्टार दिलीप कुमार जी और उस वक़्त के सुपर स्टार अमिताभ वच्चन जी। बात शुरू तो हुई उनकी उन्दा अदाकारी के चर्चे से,जिसमे मेरे पापा भी शामिल थे  (हमारा खानदान भी पूरा फिल्मची था) हम लड़कियाँ तो उस बहस में शामिल नहीं थी क्योँकि उस ज़माने में लडकियाँ चाहे कितनी भी पढ़ी-लिखी और मॉर्डन हो फिर भी हर जगह उन्हें बोलने की इजाजत नहीं थी (नहीं तो शायद मैं भी उस बहस में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही होती,वैसे भी फिल्मों के बारे में मेरा जेनरल-नॉलेज बड़ा तगड़ा था हाँ,राजनितिक बहस होती तो शायद चुप भी रह जाती)

   हाँ,तो शुरूआती बहस तो मजेदार थी कोई दिलीप जी बनाम "ट्रेजडी किंग" के इमोशनल सीन्स की खूबियाँ गिना रहा था तो कोई अमिताभ जी के "एंग्री यंगमैन" के सीन पर ताली दे रहा था मगर, धीर-धीरे दिलीप जी और अमिताभ जी की सच्ची और अंधी भक्ति  करने वाले पुजारियों की भावनाओं में उबाल आने लगा और चर्चा तर्क-वितर्क में बदलते देर ना लगी।तर्क-वितर्क पर भी बात थम जाती तो गनीमत थी मगर, देखते-ही-देखते बात लड़ाई-झगडे तक ही नहीं पहुँची बल्कि हाथापाई भी शुरू हो गई। जब तक बात स्वस्थ चर्चा तक सिमित थी तब तक मेरे दादा जी और पापा भी इस चर्चा में शामिल रहे मगर जैसे ही वो बहस का रूप लेने लगी उन्होंने उस बहस को रोकना चाहा मगर वो दीवाने किसी के रोके कहाँ रुकने वाले थे। फिर पापा और उनकी तरह के और बुजुर्ग उस चर्चा से अलग हो गए। मगर जब बात हाथापाई तक पहुँची तो सबने मिलकर बा-मुस्क्त उन्हें रोका। लेकिन जैसे ही ट्रेन एक जंक्शन पर रुकी वो सारे बहसबाज उस स्टेशन पर उतर गए फिर क्या था, ऐसा फाइटिंग सीन देखने को मिला कि पूछे मत,फिल्मों में भी ऐसा सीन कभी नही फिल्माया गया होगा,किसी का सर फटा,किसी की टांग टूटी। खैर, फिल्मो की तरह पुलिसवालों  ने आने में देर नहीं की,वो समय पर आ गए और ये कहते हुए उन दीवानों को ले गए कि -"अब बुला लो अपने-अपने सुपर स्टारों को जमानत के लिए"

    वैसी लड़ाई फिल्मों से बाहर देखकर उस वक़्त तो हम लड़कियों की जान सूख गई थी मगर घर पहुँचकर वो सारी  बातें याद कर-करके  हम खूब हँस रहें थे। उस दिन दादा जी ने हम सब को समझते हुए कहा था - "कला से जुड़ों कलाकारों से नहीं,शिक्षा से जुड़ों शिक्षकों से नहीं,ज्ञान से जुड़ों ज्ञान बाँटने वाले ज्ञानियों से नहीं, आस्था और भक्ति से जुड़ों  इस पथ को प्रदर्शित करने वाले पथप्रदर्शकों से नहीं। इंसान को विवेकशील रहना चाहिए,किसी को पसंद करना या प्यार करना,किसी के ज्ञान और भक्ति का सम्मान कर उसकी राह को अपनाना तो अच्छी बात है गलत तो तब होता है जब हम अँधा प्यार या अंधी भक्ति करने लगते हैं।कला को छोड़ कलाकारों से जुड़ जाते हैं,गुरु के दिखाए ज्ञान और भक्ति की मार्ग पर चलकर अपना जीवन सफल बनाने के वजाय गुरु के घर में जाकर बैठ जाते हैं और बिना सोचे-विचारे उन्हें भगवान से भी बड़ा बना देते हैं, हम क्यूँ  नहीं समझते कि ये भी इंसान ही है इनमे भी खामियां हो सकती है, किसी के गुणों का सम्मान कर उससे सीखो,समझों,अपनाओ और उन गुणों की पूजा करो किसी व्यक्ति विशेष को मत पूजों।

    लेकिन हमने तो बिना सोचे समझे पति तक को परमेश्वर बना डाला। सोच-समझकर किसी को भगवान बनाना चाहिए  क्योँकि भगवान से कभी गलतियाँ नहीं होती और इंसान गलतियों का पिटारा है इसलिए इंसान को इंसान ही रहने देना चाहिए। "

   दादी जी की कही एक-एक बात को हमनें गाँठ में बाँध लिया और ना ही कभी किसी से अँधा प्यार किया और ना ही किसी को अंधी भक्ति और सम्मान दिया । 

गुरुवार, 24 सितंबर 2020

"हमारी वैष्णो देवी यात्रा"

मेरा ये सफर थोड़ा लम्बा होने वाला है मगर.....यकीन मानिए, आप बोर नहीं होगें....बिघ्न-बाधाओं में उलझा ऐसा सफर शायद ही किसी ने किया हो.... 

      शायद ही ऐसा कोई हो जिसने वैष्णों देवी की यात्रा ना की हो,  वैष्णों देवी के दर्शन पर जाना बड़े सौभाग्य की बात मानी जाती है। पहले तो ये बड़ी ही कठिन यात्रा होती थी पर पिछले दो दसक से ये यात्रा सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण हो गई है और अब इस यात्रा पर लोग भक्ति और आस्था से नहीं बल्कि पर्यटक बन के जाने लगे हैं। पूरी यात्रा एक पिकनिक बन गई है....हाँ,साथ-साथ माता के दर्शन भी हो जाते हैं....कुछ अच्छी तस्वीरें मिल जाती है....सोशल मिडिया पर पोस्ट करने को....बहुतों को तो ऐसा जूनून है  कि वो हर साल माता के नाम पर ये मस्ती करने निकल जाते हैं... दस प्रतिशत लोग ही मन में सिर्फ माता के दर्शन का भाव लेकर जाते हैं।

          वैष्णों देवी या किसी भी तीर्थ यात्रा के प्रति लोगो की मानसिकता को देखकर मेरे अंदर कभी भी वहाँ जाने की लालसा ही नहीं जगी। मेरा मानना है कि भगवान हर जगह है, कण -कण में है और उससे भी थोड़ा गहराई में जाये तो, वो तो आपके अंतःकरण में ही है। हाँ ,यदि किसी तीर्थ-धाम पर जाकर भगवान के होने को महसूस करना चाहते हैं या यूँ कहें कि- परमात्मा की बनाई सुंदर  प्रकृति में उनके रूप को निरखना चाहते हैं तो सच्चे दिल से पुरी आस्था के साथ और एक व्रत की तरह इस यात्रा पर जाए और परमात्मा के अनंत मनोहरी रूप का आनंद उठाएं। और सबसे जरुरी बात स्वार्थपन, अल्हड़पन और मस्तीखोरी में इस सुंदर स्थल पर गंदगी फैलाकर प्रदूषित करने की वेवकूफी तो बिलकुल ही ना करें। हमारी इन्हीं  बेवकूफियों के वजह से ही  हम से रुष्ट होकर प्रकृति हमें  केदारनाथ जैसे प्रलय का रूप दिखा गई ,हम फिर भी सचेत ना हुए। खैर,इन सभी बातों से यकीनन किसी को दरकार नहीं।

      हाँ,तो मैं ये बता रही थी कि -माता के प्रति पूरी आस्था होते हुए भी मेरे अंदर कभी भी वहाँ जाने की इच्छा ही नहीं हुई थी।  परन्तु माँ ने मुझे अपने दर्शन का सौभाग्य दिया। यकीनन वो माता का बुलावा ही था क्योकि जाने के दो दिन पहले तक मैं सपने में भी नहीं सोची थी कि- मैं माँ के दरबार जाऊँगी।

     2008 की बात है -उनदिनों हम पति -पत्नी जीवन के बड़े ही कठिन दौर से गुजर रहें थे। पारिवारिक,आर्थिक ,मानसिक और शारीरिक  हर तरह से हम पीड़ित थे। उन दिनों कही भी जाने की बात हम सोच तक नहीं सकते थे। ऐसे समय में एक दिन मेरे पति के एक दोस्त का फोन आया (जो आर्मी में थे और जम्मू में उनकी पोस्टिंग थी )

    उन्होंने कहा -" मनोज ,हमारा ट्रांस्फर हो गया हैं और हम दस दिन के अंदर जम्मू छोड़ देगें ,हमारी दिली खवाहिश हैं कि हम सारे दोस्त सपरिवार एक बार माता के दर्शन करने चलें, मैंने तुम सब का टिकट करवा दिया है और मैं ना नहीं सुनुँगा ,तुम्हे आना ही होगा।"
    हम बड़े असमंजस में पड़ गए क्योकि एक तो आर्थिक स्थिति बुरी और दूसरे तीन महीने की लम्बी बीमारी भुगत कर मुझे विस्तर छोड़ें मात्र 15 दिन ही हुए थे। पतिदेव परेशानी में खुद से ही बड़बड़ा रहे थे-" नहीं जा पाएंगे.... तुम्हारी बीमारी का ही बहाना बना देगें...सभी पहले से जानते हैं कि तुम बीमार थी...हाँ,यही ठीक होगा।" लेकिन उनकी बातें मुझे सुनाई नहीं दे रही थी। अचानक से पता नहीं कैसे, मेरा मन माता के दर्शन को मचल उठा,मुझे महसूस होने लगा कि -जब हम माता के दर्शन कर लौटेगें तो हमारे सारे दुःख दूर हो जाएंगे। लेकिन आर्थिक स्थिति के कारण मैं कुछ बोल नहीं पाई। शाम को जब पापा मेरे घर आये तो मैंने अपने दिल की बात उन्हें बताई। सुनकर पापा खुश होते हुए बोले -" बेटा ,तुम खर्च की चिंता नहीं करों...मैं पैसा दूँगा....फिर थोड़ा सोचते हुए बोले-अगर तुम्हारी माँ और मैं भी साथ चलूँ तो कैसा रहेंगा.....आज तक हम भी तो माता के दर्शन नहीं कर पाए है....तुम सब इतने लोग रहोगे हम भी उसी में एडजेस्ट कर लेगें।
    माँ-पापा के साथ चलने की बात से तो मैं और ज्यादा ही खुश हो गई। मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि -अचानक ये सब क्या हो रहा है,सुबह 9 बजे तक तो इन बातों का दूर-दूर तक जिक्र भी नहीं था। मैं खड़ी सोच ही रही थी कि पापा पैसे देते हुए बोले -"सोच क्या रही हो भागों तैयारी करों...एक दिन ही है...नया  कपडा  भी तो लेना होगा।" तब तक पतिदेव भी आ गए,सारी बातें सुन बोले- "जय माता दी बोलो और चलो तैयारी करों" (अब से पहले मैंने कभी भी किसी भी परेशानी में पापा से आर्धिक मदद नहीं ली थी)7 जून की शाम को ट्रेन थी और 5 जून की शाम को ये सारी बातें हो रही थी।6 जून को दिन में आनन-फानन में हमने सारी तैयारी कर ली।आगे क्या होने वाला है इन बातों से अनजान...
     रात को अचानक माँ को तेज़ बुखार चढ़ गया और 7 जून की सुबह वो पूरी तरह पस्त हो चुकी थी। पापा आकर बोले-शायद अभी हमारा बुलावा नहीं आया है आप सब ये पैसे लो और ख़ुशी-ख़ुशी माता के दर्शन पर जाओं। मन उदास हो गया फिर भी माता की मर्जी मान हम निकल पड़ें।
   पतिदेव के दो दोस्तों का परिवार बेतिया (बिहार) से आने वाला था जो हमें  दिल्ली स्टेशन पर ही मिलते और वहाँ से हम सभी का टिकट पूजा एक्सप्रेस में बुक था।  जब हम स्टेशन पहुंचे तो हमें दूसरा झटका मिला वहाँ पर सिर्फ और सिर्फ इनके एक दोस्त आलोक जी अकेले मिले बाकी कोई नहीं। पता चला सबके साथ अचानक कोई ना कोई समस्या आ गया था और कोई भी नहीं आ पाया है। कहाँ बारह लोगो का ग्रुप आने वाला था और इकठ्ठे हुए मात्र चार,हम पति-पत्नी, 10 साल की मेरी बेटी और आलोक जी। मन और उदास हो गया ये सोचकर कि-"ये हो क्या रहा है और आगे और क्या होगा"
    ख़ैर,हम 8 जून की सुबह जम्मू पहुँचे,वहाँ अभिनव जी(मेरे पति के आर्मी वाले दोस्त) हमें लेने के लिए पहुँचे थे। उनके घर पहुंचकर उनके परिवार वालों से मिलकर अच्छा लगा,लगा आगे अब सब ठीक होगा।दिन भर वहाँ रूककर रात 9 बजे तक  हमें कटरा के लिए निकलना था और वहाँ से चार बजे सुबह से चढ़ाई आरम्भ करनी थी। दोपहर का खाना वगैरह खाकर हम एक दूसरे से गप्पे मारते हुए आराम किये।शाम को मैं और भाभी जी (अभिनव जी की पत्नी) कुछ खाना बनाने लगे, सफर पर ले जाने के लिए। बाकी नहा धोकर तैयार हो रहे थे। सभी नहा चुके थे बस अभिनव जी बचे थे उनके नहाने का पानी गर्म हो रहा था। अभिनव जी हल्ला मचा रहे थे कि जल्दी करो। भाभी जी जल्दीबाजी में जैसे ही गर्म पानी लेकर बाथरूम की ओर जाने लगी पुरे पतीला का पानी उनके पैरों पर गिर गया। अब तो अफरा-तफरी मच गई,भाभी जी का पूरा पैर बुरी तरह जल गया था। भाभी जी ने कहा -मैं तो अब जा नहीं पाऊँगी...आप बेटा  को लेकर इन लोगो के साथ चले जाये...बेटी मेरे पास रहेगी मेरी देख-भाल के लिए। अभी बातें हो ही रही थी कि  तभी, अभिनव जी के ऑफ़िस से फोन आया और उन्हें पता चला कि जो क्वॉटर उन्हें 15 जून को खाली करना था अब उन्हें 12 को ही खाली करना होगा। अब तो सारा मंज़र ही बिगड़ गया। हमने कहा -कोई नहीं जायेगा अब ...सब यही साथ रहेंगे...11 जून को हमारी वापसी का टिकट है अब इतने दिन आप सब के साथ ही गुजारेंगे। परन्तु भाभी जी को बुरा लग रहा था उन्हेने हमें मजबूर किया कि -आप सब आये है तो माता के दर्शन करने जरूर जाए और हमें यात्रा पर निकलना ही पड़ा । मन फिर थोड़ा उदास हो गया मगर मन में माता की दर्शन की ख़ुशी लिए हम निकल पड़ें, बस वही चार लोग और चारो अनजान उन राहों से जहाँ जाना था हमें.....
    रात के करीब 12-1 बजे हम कटरा पहुँचे,वहाँ एक और मुसीबत हमारी राह देख रहा था,वहाँ एक भी होटल या धर्मशाला में हमें जगह ही ना मिल रहा था और ऊपर से मूसलाधार बारिस। बड़ी मुश्किल से सर छुपाने की एक जगह मिली जहाँ हम माँ-बेटी को सामान के साथ बैठाकर ये दोनों दोस्त पर्ची कटवाने चले गए (यात्रा पर निकलने के लिए जो पर्ची बनती है)
    वहाँ पता चला कि -अत्यधिक भीड़ और बारिस की वजह से पर्ची कटनी बंद हो गई है अब 10 जून की सुबह ही पर्ची मिलेगी। अब तो सर छुपाने की जगह ढूँढना जरुरी हो गया था, बा-मसक्त हमें एक धर्मशाला में जगह मिल ही गया,अब लगभग 24 घंटे हमें गुजारने थे,बारिस इतनी जबरदस्त की कटरा में भी कही घूमने नहीं जा पाए। खैर, 10 जून को 5 घंटे की लम्बी लाईन में लगने के बाद 11 बजे दिन में आखिरकार हमें पर्ची मिली और 12 बजे तक हम माता के दरबार के लिए चढ़ाई करना प्रारम्भ किये।वहाँ फुटपाथ पर प्लास्टिक की हल्की-हल्की बरसाती (raincoat)मिल रही  थी हम वही पहनकर बारिस के मज़े लेते हुए मन में माँ के दर्शन की ख़ुशी लिए हुए,इस विश्वास के साथ की आगे सफर आनंदायक ही होगा, चल पड़ें।पर वो सफर ही क्या जिसमे रोमांच ना हो और बस चेकपोस्ट पर पहुंचते ही....
     चेकपोस्ट पार करते ही जो ब्रिज आता है वहाँ अचानक से भगदड़ मच गया, हमनें देखा बेलगाम घुड़सवारों का एक जत्था (जिसमे शायद कुछ घोड़े बिदक गए थे)लोगो को रौंदते हुए तेज़ी से बढे आ रहें थे और लोगों में अफरा-तफरी मच गई...सारे अपनी जान बचाने के लिए धक्का-मुक्की करने लगे ...हम कुछ समझ पाते इससे पहले दो घुड़सवार हम माँ-बेटी के बिलकुल सामने....वो तो इनके दोस्त ने तेज़ी दिखाई और हम माँ-बेटी को पकड़कर खींच लिया....पतिदेव हल्के चपेट में आने के कारण गिर पड़ें...मगर जल्दी ही खुद को संभलकर उठ खड़े हुए थे...हम चारों एक दूसरे को संभालते हुए एक किनारे पर सिमटकर खड़े हो गए।करीब 20-25 घोड़ो का जत्था था...उनके गुजरते ही ऐसा लगा जैसे कोई भयानक तूफान गुजर गया...और कई लोगो को घायल कर गया....हम शायद खुश किस्मत थे जो संकट हमें सिर्फ छूकर गुजर गया। मेरी बेटी डर से काँप रही थी...हम सब भी थोड़े घबराए हुए थे....इसलिए हम थोड़ी देर ठहर जाना ही उचित समझे। वही ढाँबे पर रुक हम कुछ खाने-पीने लगे और माता का शुक्रिया भी किया कि -उन्होंने हमें इस संकट से बचा लिया। मगर मेरे मन में एक हलचल सी मची हुई थी ये सोच-सोचकर कि-आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ?
    इन सब बातों में ही दो बज गया था। मैं शारीरिक रूप से कमजोर थी बेटी तो सहम ही गई थी इसलिए हमारी चलने की रफ्तार थोड़ी धीमी थी,हमें अर्धकुमारी पहुँचने में ही तीन घंटे लग गए। वहाँ पहुँचकर पता चला कि कल (यानि 11 जून)दोपहर 2 बजे  तक ही हमें दर्शन हो पाएंगा और उसी दिन  दिल्ली वापसी के लिए शाम 6 बजे का हमारा ट्रेन था तो हमने वहाँ का टिकट नहीं लिया लेकिन आलोक जी का 15 को वापसी का टिकट था इसलिए वो पर्ची ले लिए। अब हम माता के दरबार की ओर चल पड़े। रात 9 बजे तक हम मंदिर पर पहुंचे....नहाते-धोते 10 बज गया....जब दर्शन के लिए लाईन लगाने पहुँचे तो हमारे होश उड़ गए.....करीब 2 किलोमीटर से भी ज्यादा लम्बी लाईन। हमें अभिनव जी से आर्मी कोटे पर पास मिल सकता था मगर आने के समय जो बेचैनी फ़ैल गई  थी उस वजह से हम पास लेना भूल गए थे।वैसे अच्छा  ही हुआ था...जो भूल गए क्योँकि माता के दरबार में भी आम और खास होने का जो व्यपार चल रहा था....वो मुझसे देखा नहीं जा रहा था....बड़ा बुरा लग रहा था कि- सब ठंढ में ठिठुरते हुए कतार में लगे है और उस कतार को घंटों रोककर माता के दरबार में भी VIP लोगो की VIP पूजा चल रही थी। खैर,सुबह तीन बजे हम गुफा में प्रवेश कर पाए।(वो भी नए वाले गुफा से) हममें से कोई पहले यहाँ नहीं आया था सो हमें किसी भी बात की कोई जानकारी ही नहीं थी। सबसे आगे बेटी थी और फिर मैं फिर पतिदेव उनके पीछे आलोक जी थे। जैसे ही माता के आगे पहुँचे किसी ने अचानक बेटी का हाथ पकड़कर तेज़ी से खींच लिया...मैं उसका हाथ पकड़ी थी सो मैं भी खींच गई....देखा तो पुलिस था निकालो-निकलो करके चिल्ला रहा था....मुझे कुछ समझ ही नहीं आया तब तक पीछे से काफी लोग आ चुकें थे सो हमे मंदिर से बाहर निकलना पड़ा। और इस तरह जिनके दर्शन के लिए इतनी रुकावटें झेलकर मैं पहुँची थी उन्हें देख भी नहीं पाई कि-"वो है कैसी है?" शायद मेरे साथ ये सब इसलिए हुआ क्योकि मैं कभी भी किसी तीर्थस्थल पर गई ही नहीं थी तो वहाँ कैसा व्यवहार करते हैं या कैसी तेज़ी दिखाते है ये मैं जानती ही नहीं थी।मन रोने-रोने सा हो गया ख़ैर,मंदिर के बाहर ही प्रांगण में बैठकर मैंने मन ही मन माता का सुमिरन किया और अपनी अनजानी गलतियों की लिए क्षमा भी मांगी। 
   हल्की-फुल्की बारिस हो ही रही थी सो कही ठहरने की जगह भी बड़ी मुश्किल से मिली। जैसे-तैसे खाना खाकर हम आड़े-टेढ़े होकर थोड़ी देर आराम करने लगे। हमें किसी तरह 5 बजे तक भैरव मंदिर निकलना था (क्योँकि कहते हैं  कि अगर भैरवनाथ का दर्शन नहीं किया तो माता का दर्शन करना सार्थक ही नहीं होगा) और फिर हर-हाल में 3-4  बजे तक  जम्मू पहुँच जाना था क्योँकि 6.15 बजे हमारी ट्रेन थी। 
    मेरी बेटी थकान से चूर थी वो कुछ खा भी नहीं पा रही थी क्योंकि वहाँ जो कुछ भी मिल रहा था वो उससे बिलकुल खाया ही नहीं जा रहा था बस ब्रेड, बिस्कुट और जूस-वगैरह पी रही थी और अब तो वो भी उससे खाया नहीं जा रहा था । भूख से वो तड़पने लगती तो मुझे उसके पेट पर कपडा बांधना पड़ता। भैरवनाथ का दर्शन करके नीचे आते-आते हमें एक बज गया। बेटी बड़ी मुश्किल चल पा रही थी,अब आप कह सकते है कि -घोडा कर लेते लेकिन एक तो हमारे पास पैसे कम थे और दूसरे जो चढ़ाई आरम्भ करते ही घोड़ो ने हमें डराया था उससे हिम्मत ही नहीं हो रही थी। सफर पर धीरे-धीरे मुसीबतें और बढ़ती ही जा रही थी। समझ ही नहीं आ रहा था कि -"जीवन में पहले से क्या कम मुसीबतें थी जो मातारानी हमें यहाँ बुलाकर और सता रही थी। अलोक जी का साथ भी छूट चूका था वो अर्धकुमारी में ही रूक गए थे। 

    जब हम कटरा पहुँचे तो पता चल रहा है कि -वहाँ ट्रांसपोर्ट की हड़ताल है... कोई भी बस या गाडी जम्मू नहीं जाएगी...एक-दो प्राईवेट एजेंसियां जो बस चला भी रही थी उनके आगे तो माता के दरबार से भी ज्यादा लम्बी लाईने लगी थी। हम माँ बेटी को अलग-अलग लाईन में टिकट के लिए खड़ाकर पतिदेव कुछ और व्यवस्था मिले, ये देखने चले गए। बेटी का हाल देख मुझे रोना आ रहा था उससे खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था....अगर आज हम जम्मू नहीं पहुँचे तो ट्रेन छूट जाएगी....सबसे बड़ी परेशानी ये थी कि-हमारे पास गिने-चुने पैसे थे....फिर हमारा कब टिकट बनता...अभिनव जी भी 12 जून को ही घर छोड़कर बिहार चले जाने वाले थे....हम क्या करेंगे....ये सब कुछ झेलते-झेलते मेरी अंतरात्मा कुहुक उठी। दुःख के मारे तो हम पहले से भी थे,एक उम्मीद थी की ये सफर हमें थोड़ी ख़ुशी देगा जो अब तक नहीं मिली थी बल्कि मुसीबतें ही ज्यादा मिल रही थी और अब ये सबसे बड़ी मुसीबत थी। मैं तड़पकर रो पड़ी,मैंने माता से शिकायत कर दी -"हे मातारानी,मेरी सब्र का बांध टूट चूका है...आज अगर हमारी ट्रेन छूट गई और..हमें और मुसीबतों का सामना करना पड़ा तो...मैं आप से वादा करती हूँ...आज के बाद आपके दरबार में तो क्या, किसी भी देवी-देवता के दरबार में मैं नहीं जाऊँगी।"
    मेरी बात पूरी ही हुई थी कि पतिदेव बड़ी तेज़ी से दौड़ते हुए आये, सामान उठाया और मुझे बोले -"कुछ सवाल नहीं पूछों,बेटी का हाथ पकड़ों और जितना तेज़ दौड सकती हो दौड़ो।" पैरों में चलने की क्या, खड़े होने तक की जान नहीं थी और हम बे-तहाशा अपने शरीर को जबरदस्ती खीचतें हुए दौड़े जा रहे थे। करीब 5-600 मीटर की दौड़ लगाकर हम एक बस के पास पहुँचे जहाँ कंडक्टर अपने हाथ में चाय का ग्लास लिए बस के गेट पर खड़ा था,पतिदेव हाँफते हुए बोले -"हम आ गए सर" कंडक्टर पहले पतिदेव को देखा फिर अपनी चाय की गिलास की ओर देखते हुए मुस्कुरा दिया और इशारे से बस में चढ़ने  को कहा। बस में एक भी सीट खाली नहीं थी इन्होने कहा -"हमें खड़े होकर ही जाना पड़ेगा।"फिर उन्होंने मुझे सारा माज़रा बताया कि -किसी सवारी के तलाश में जब ये घूम रहें थे तो इन्हे ये बस दिखी जो सीधे दिल्ली को जा रही थी इन्होने कंडक्टर को सारी बातें बताकर  बड़ी मिन्नत की कि-हमें जम्मू तक छोड़ दे,दोगुना किराया देने को भी कहा मगर वो नहीं मान रहा था,इनके बहुत जिद्द करने पर इन्हे टालने के लिए उसने फ़िल्मी अंदाज़ में एक शर्त रख दिया,बोला -"मेरे हाथ के इस चाय के गिलास को देखों अगर मेरी चाय ख़त्म होने तक तुम आ जाओंगे तो तुम्हे बस में चढ़ा लूंगा मगर सीट फिर भी नहीं मिलेगी खड़े होकर ही जाना होगा" उसकी शर्त सुनते ही ये दौड पड़ें थे। कंडक्टर ने अपनी बात का मान रखा और हमें बस में चढ़ने दिया मगर सीट नहीं मिली। हमारे बस में चढ़ते ही बस खुल  गई थी। थकान और घुमावदार सड़क के कारण हम बस में खुद को खड़ा भी नहीं रख पा रहें थे,बेटी बार-बार गिर जा रही थी,हम दोनों ने उसे अपने बीच में दबा रखा था।कोई भी तरस खाकर मेरी बेटी तक को बैठने का जगह नहीं दे रहा था। उस दिन ऐसा महसूस हो रहा था कि-"सारी दुनिया बे-रहम हो चुकी है या भगवान के साथ-साथ सारे हमारे दुश्मन  चुकें हैं।"जब हम खुद को नहीं संभाल पाए तो, बस में नीचे ही बैठ गए लोग इस पर भी ऐतराज़ कर रहें थे और हम भिखारियों की तरह उनसे मिन्नतें  कर रहें थे। हाँ,बस के कंडक्टर ने हम पर रहम किया था और उसने हमसे पैसे भी नहीं लिए थे। हम 5.30 बजे तक जम्मू पहुँचे....बस ने जहाँ हमें उतरा था...वहाँ से रेलवे स्टेशन तीन किलोमीटर दूर था...वहाँ भी ट्रान्सपोर्ट का हड़ताल...ये सुन हमारे तो रहे सहे होश भी उड़ गए...अब क्या करें? बड़ी मुश्किल से एक ऑटों वाला राजी हुआ वो भी इस शर्त पर की स्टेशन से आधा किलोमीटर पहले ही वो हमें छोड़ देगा। अब ऐसी परिस्थिति में अभिनव जी के घर जाकर सामान लाने का भी वक़्त नहीं था। हमने अभिनव जी को फोनकर सारी  बात बताई उन्होंने कहा मैं समान लेकर स्टेशन आता हूँ,चुकि टिकट भी समान के साथ था इसलिए सामान माँगवाना भी जरुरी ही था। 
    ऑटो वाले ने जहाँ हमें छोड़ा था वहाँ से आधे किलोमीटर की वो "पैदल सफर" की यादें इतनी खौफनाक है कि -आज भी मेरी बेटी वो दिन याद कर सिहर उठती है। हमारे पैर बेजान हो चूके थे,एक-एक कदम उठाना मुश्किल था। स्टेशन पहुँचते-पहुँचते 6 बज गया था अभिनव जी आ चूके थे मगर चैकिंग करवाकर प्लेटफार्म तक 15 मिनट में पहुँचना असम्भव था क्योँकि यह भी लाईन बहुत लम्बी थी, यात्री आपस में धक्का-मुक्की और झगड़ें-लड़ाई पर उतर आये थे। बा-मसक्त अपने रुसुक का (आर्मी में होने का) प्रयोग कर अभिनव जी ने हमें प्लेटफॉम तक पहुँचाया। प्लेटफॉर्म पर पहुँचते ही ट्रेन खुल चूकी थी,जैसे-तैसे चलती ट्रेन में ही किसी भी कम्पार्टमेंट में हम चढ़े गए,हमारे चढ़ने के बाद एक-एक करके हमारे सामान को अभिनव जी ने फेका फिर ट्रेन के साथ दौड़ते हुए ही दो दर्जन केले लेकर दिए और हाँफते हुए ही भीगी आँखे लिए हाथ हिलाते हुए हमें अलविदा कहा। 
    ट्रेन में अपने सीट तक पहुँचकर जब हम बैठे तो उस वक़्त की  मनोदशा मैं  बता नहीं पाऊँगी। समझ ही नहीं आ रहा था...ये हुआ क्या....कैसा सफर था ये.....क्यूँ हुआ हमारे साथ ऐसा ?भूख और थकान से हम बेहाल थे दो-चार केले खाकर हम निद्रामाता के गोद में चलें गए क्योँकि अब हमें शुकुन वही मिल सकता था। दुनिया से बे-खबर  इतनी गहरी नींद हम सो गए कि -खाना का ऑडर लेने वाला कब आकर चला गया पता ही नहीं चला। 9 बजे जब भूख से बेटी के पेट में दर्द होने लगा तब उसने उठाया। पूछने पर पता चला कि -अब खाना ख़त्म हो चूका है। बेटी रो रही थी मैंने एक भेंडर के पास जाकर मिन्नत की कि -कुछ भी दे दो। तब उसने अपने खाने से निकलकर एक पैकेट फ्राइड राइस दिया उस वक़्त वो इंसान मुझे देवतुल्य अन्नदाता नजर आ रहा था। 
 12 जून की सुबह सफर खत्म हो चूका था लेकिन छोड़ गया था....ढेरों सवाल और अजीबोंगरीब अनुभव....समझा गया था भूख का मतलब... वक़्त की, इंसानियत की कीमत...सीखा गया था कि -जीवन में परिस्थितियाँ बद-से-बदतर हो सकती है....ऐसे वक़्त में संयम और हौसला बनाये रखना कितना जरुरी है....और सबसे बड़ी सीख....हर इंसान को जीवन का कोई भी सफर अकेले ही तय करना होता....किसी ने साथ चलने का वादा किया भी हो तो क्या.....उसके वादें पर भरोसा करने के वावजूद भी.....खुद को सिर्फ और सिर्फ खुद के और भगवान के भरोसे ही रखना। 
  हम माता के दरबार से लौट आये थे मन में ढेरों असमंजस और सवाल लिए... लेकिन कहते हैं न कि परमात्मा की कोई भी लीला बे-माने नहीं होता है.....धीरे-धीरे हमें समझ आने लगा था.....वहाँ से लौटे के बाद हमारे भीतर एक अजीब सी शांति और संतोष का अनुभव होने लगा.....एक-एक करके हमारे जीवन की हर एक समस्या का सामाधान मिलने लगा.....और सबसे बड़ी बात हमें जो लोगों से अपेक्षाएं होती थी और उपेक्षित होने पर जो दुःख होता था वो बिलकुल खत्म हो गया किसी से कोई अपेक्षाएं ही नहीं रही...और रोग-दुःख तो मेरे घर से कोसो दूर हो गया.....धीरे-धीरे हमारे घर में सुख,शांति और समृद्धि का वास होने लगा। शायद, नहीं यकीनन मातारानी  ने हमारे शेष जीवन के कष्टों को उन्ही 6 दिनों में देकर हमारे सारे कष्ट हर लिए थे और जीवन को सुखमय बनाने के कई मंत्र सीखा गई थी....हम पति-पत्नी जो अनगिनत परेशानियों के वजह से एक दूसरे से दूर होते जा रहें थे... करीब आ गए थे। 

                      ये सफर "मेरे जीवन परिवर्तन" का सफर था......   
                                        (और पहला और आखिरी तीर्थयात्रा भी )

बुधवार, 2 सितंबर 2020

एक यादगार मुसाफिर

   

    यात्रा करने के साधन तो बहुत से है पर मुझे सबसे आरामदायक और मनोरंजक  सफर ट्रेन का ही लगता था और हैं भी। पहले तो वैसे भी हवाई यात्रा सबके बस की बात नहीं थी और बस या कार से सफर करना मुझे बिलकुल अच्छा नही लगता। अगर लम्बी यात्रा हो तो ट्रेन के क्या कहने,  12 -15 घंटे के लम्बे सफर में ट्रेन  का वो कम्पार्टमेंट घर जैसा एहसास देने लगता है और सफर में जो अजनवी साथ होते हैं वो जन्मों के बिछुँड़ें साथी से लगने लगते हैं (ये मैं बीते ज़माने की बात कर रही हूँ)। ट्रेन की झुकझुक आवाज़ संगीत की एक अनोखे साज से निकली मधुर आवाज़ लगती है। बस्ती ,जंगल ,नदी और पहाड़ों  को पार करती ये झुकझुक गाड़ी कई  मनोरम दृश्यों का दर्शन करा देती है। रात के सन्नाटों को चीरती जब ये तेज़ गति से अपनी  पटरियों पर दौड़ रही होती है तो ऐसा लगता है जैसे कोई मलंग अपनी ही मस्तियों में डूबा हुआ अपनी मंजिल की ओर बे -खौफ बढ़ा जा रहा है।
   मेरी ज्यादातर यात्राएं पापा के साथ ही हुई है क्योँकि पापा की लाड़ली थी तो वो हर जगह मुझे ही अपने साथ लिए घूमते थे। घर में इस बात के लिए दादी के ताने भी सुनने को मिलता था, वो हमेशा पापा को ताना देती -" बेटी को इंदिरा गांधी बना रखा है जहाँ जाता है बेटी को साथ लिए फिरता है " मगर पापा को इससे फर्क नहीं पड़ता था, उन्हें तो मेरे बिना कोई सफर करना ही नहीं था।
     पापा के साथ ऐसे ही एक सफर में एक अजनवी से मुलाकात हो गई थी, एक ऐसा मुसाफिर जिसकी हल्की  झलक आज भी याद आ ही जाती है। बात उन दिनों की है जब मैं 10 वी में थी, 15 साल की उम्र थी मेरी मगर लड़का-लड़की के प्रति आकर्षण वाले एहसास से मेरा मन अब तक अछूता था। कोई लड़का मुझे देख रहा है इस बात का ना मुझे एहसास ही होता था ना ही मैं इसकी परवाह करती थी। अपनी ही मस्ती में मग्न, जो मिला उसी के साथ बातों में मसगुल हो जाना, ठहाकें लगाना बस यही आता था मुझे, मेरा बचपना मुझ पर अभी तक हावी था, अब इसके लिए कौन मुझे कैसे देख रहा हैं या क्या सोच रहा है, मेरे पीढ़ पीछे क्या बोल रहा है, इससे मैं बे-खबर रहती थी। मेरी इन्ही आदतों के कारण सफर में भी मैं बहुत जल्दी सबसे घुल-मिल जाती थी, वो हम-उम्र हो ,बच्चा हो या बूढ़ा फर्क नहीं पड़ता था, सब मेरे दोस्त बन जाते थे। 
    तो मेरे इस सफर के दौरान भी कुछ ऐसा ही हुआ, हमारे साथ कपार्टमेन्ट में एक परिवार था तीन बच्चें और पति पत्नी, मैं उन सब के साथ बड़ी जल्दी घुलमिल गई और मेरी मस्ती शुरू हो गई। उसी कम्पार्टमेंट में 17 -18 साल का एक लड़का भी बैठा था, आकर्षक व्यक्तित्व था उसका मगर बेहद शांत और गंभीर। हाँ,हम सब जब बातें करते तो वो बीच-बीच में थोड़ा बहुत बोल लेता था या हल्की मुस्कान बिखेर देता था।मुझे ऐसे लोग बिलकुल पसंद नहीं थे, मुझे तो हंसी ठहाकें लगाने वाले जिंदादिल लोग पसंद थे पर पता नहीं क्युँ, वो मुझे थोड़ा-थोड़ा अच्छा लग रहा था।
    खैर ,सफर के दौरान मैंने गौर किया कि-जब से मैं ट्रेन में बैठी थी ये महाशय चोरी छिपे मुझे ही देखें जा रहें थे। मुझे ऐसे लोग भी बिलकुल पसंद नहीं थे सो, मैंने उन्हें इग्नोंर किया और बच्चों के साथ लगी रही और उसकी निगाहें मुझ पर टिकी रही। जब मैं उसे घूरने लगती तो हल्की सी मुस्कान के साथ नजरें नीची कर लेता। ऐसा नहीं था कि -पहली बार कोई लड़का मुझे घूर रहा था मगर उसमे कुछ अलग बात तो थी और सब से आकर्षक थी उसकी शालीनता। पापा से तो वो खूब बातें करता पर मुझसे बिलकुल नहीं। रात हुई हम सबने साथ ही मिल-बाँटकर खाना खाया, वो खाना नहीं लाया था तो पापा मुझे उसे भी खाना देने को बोले, मैंने दो पराठे और सब्जी उसे भी दे दी, वो मुस्कुराते हुए थैंक्यू कह कर ले लिया। खा-पीकर सब अपने-अपने बर्थ पर सोने चले गए। वो ठीक मेरे सामने वाले बर्थ पर था और लगातार एक हलकी मुस्कान लिए मुझे देखें ही जा रहा था। उसकी निगाहों में कुछ तो था जो मुझे भी असहज कर दे रहा था। ऐसा मुझे पहली बार महसूस हो रहा था सो और भी अजीब लग रहा था। मैं बार-बार मुँह फेर कर सो जाने की कोशिश कर रही थी मगर मुँह फेरने के बाद भी मैं उसकी निगाहों से खुद को बचाने में असमर्थ हो रही थी। वो कोई गलत हरकत नहीं कर रहा था मगर उसकी मुस्कुराती नजरें बहुत कुछ बोलने में समर्थ थी।
    मैंने सोचा अब मैं इसे घूरना शुरू करती हूँ तो शायद वो अपना मुँह फेर ले, मैं भी उसकी तरफ एकटक  देखने लगी मगर मेरे साथ ऐसा पहली बार हुआ कि -मैं ज्यादा देर उससे नजरें नहीं मिला पाई, फिर अपनी आँखें बंद करना ही मुझे उचित लगा। मैं अपनी आँखें भींचे सोने की कोशिश करने लगी। मगर जब नींद खुलती तो देखती कि -उसकी आँखें तो अब भी मुझ पर ही टिकी है। खैर, इस आँख-मिचौली में मैं कब गहरी नींद सो गई मुझे पता ही नहीं चला।
    सुबह जब मेरी आँख खुली तो देखती हूँ कि-सामने का बर्थ खाली है, मुझे लगा शायद वो बाथरूम गया होगा। बाकी सभी लोग अभी सो ही रहे थे। तभी मेरी नजर मेरी उंगलियों के बीच फंसी एक पर्ची पर गई, दो सेकेण्ड के लिए मैं बुरी तरह सिहर गई ,बड़ी हिम्मत करके मैंने इधर-उधर देखकर वो पर्ची खोली, उसमे लिखा था -"रानी, तुममे मुझे अपनी  "सोलमेड" नजर आ गई है...एक रात में ही मैं तुम्हे बेहद प्यार करने लगा हूँ...अगर तुम्हारे दिल में भी मेरे लिए कोई फिलिंग आ गई है तो प्लीज़ इस नंबर पर मुझे फोन करना...मैं बेसब्री से तुम्हारे फोन का इंतज़ार करुँगा...मैं तुम्हें अपना नाम नहीं बताऊँगा...अगर कॉल करोगी तब तो मेरा नाम जान ही जाओगी.. अगर नहीं कर पाओगी तो एक अजनवी समझ भूल जाओगी।" ये दो लाईन पढ़ते-पढ़ते मुझे महसूस हुआ कि-मेरी पलकें गीली हो गई है,ऐसा कैसे हुआ, क्युँ हुआ, समझ ही नहीं पाई।
    मैंने उस पर्ची को छुपाकर अपने पर्स में रख लिया। वो कौन था, कहाँ से आ रहा था, कहाँ उतर गया, उसका नाम क्या था मैं कुछ नहीं जान पाई थी। मगर मेरे बक-बक करने के कारण वो मेरे बारे में सब कुछ जान चुका  था। सफर खत्म हुआ और हम लौटकर अपने घर आ गए,कई महीनों तक वो पर्ची मेरे पास रही, रोज उसे खोलकर पढ़ती और सोचती -" कॉल करूँ क्या?" पर हमारे संस्कारों ने मुझे ये करने की इजाजत नहीं दी, मैं अपने पापा के विश्वास को नहीं तोड़ सकती थी। उस दौर में छोटी उम्र में किसी लड़के के बारे में सोचना भी गुनाह था,छोटी उम्र क्या हम लड़कियों को खुद के पसंद का लड़का चुनना तो पाप ही समझा जाता था, हम लड़कियों को ऐसे ही संस्कार मिले थे। एक दिन हिम्मत करके वो पर्ची मैंने फाड़कर फेक ही दी, मेरे पापा के मान -मर्यादा से बड़ा मेरे लिए कोई नहीं था ना है। कई बार ऐसा लगता कि -कही वो मेरे घर तक तो नहीं आ जाएगा क्योँकि पापा से बातों-बातों में वो सब कुछ जान चुका था। मगर वो नहीं आया, यकीनन उसे मेरी "पहल" का इंतज़ार होगा। 
    आज भी ट्रेन के सफर के दौरान कोई लड़का किसी लड़की को टकटकी बाँधे देख रहा होता है तो उस मुसाफिर की याद आ ही जाती है। 




अँधा प्यार,अंधी भक्ति

       हमारी आदत होती है कला से कम और कलाकारों से ज्यादा जुड़नें की,खेल को कम खिलाड़ियों को ज्यादा महत्व देने की,भगवान की भक्ति कम मगर ढोंगी ब...