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मंगलवार, 23 अगस्त 2022

"मुंबई की लोकल ट्रेन"

   



   "मुंबई की लोकल ट्रेन" इससे कौन परिचित नहीं है। सर्वे बताती है कि रोजाना  लगभग 75 लाख लोग इस ट्रेन से सफर करते हैं। तो मान ले कि-एक दिन में स्विट्जरलैंड जैसे देश की पूरी आबादी और एक साल में संसार की एक तिहाई आबादी जितने लोग मुंबई लोकल ट्रेन से सफ़र कर लेते हैं। भले ही बहुत से देशों में बुलेट ट्रेन है जो बहुत ज्यादा स्पीड से दौड़ सकती है मगर वो "आमची मुंबई"की लोकल ट्रेनों के जैसे इतने यात्रियों को लेकर नहीं दौड़ सकती। इसलिए इसकी शान ही अनोखी है। 

   जब इतनी बड़ी आबादी हर दिन सफ़र करेगी तो जाहिर सी बात है कि लोगों को कई मुश्किलों का सामना भी करना पड़ता। पहले तो समय से  ट्रेन पकड़ने की लड़ाई, फिर खचाखच भरे ट्रेन में अजनबियों से धक्का-मुक्की कर अपने लिए खड़े भर रहने के लिए जगह की खातिर लड़ाई, एक बार ट्रेन में चढ़ जाने के बाद खुद को ट्रेन में दबने से बचाए रखने के लिए लगातार जोर आजमाइश, और फिर किसी तरह सफर पूरा कर लेने के बाद सही सलामत अपने गंतव्य स्टेशन पर उतरने की लड़ाई। ये लड़ाई तो वो लोग करते हैं जो अपना सफर सावधानी पूर्वक सुरक्षित तय करना चाहते हैं। लेकिन दरवाजे पर लटक कर सफर करने को मजबूर लोगों को तो अपनी जीवन रक्षा की लड़ाई भी लड़नी होती है। ये अलग बात है कि कुछ लोग हीरोपंती में और लापरवाहियों की वजह से अपनी जान गवा देते हैं। आँकड़ों के मुताबिक रोजाना 10 से 12 लोग इस लोकल ट्रेन के रास्ते में अपनी जान गवां देते हैं। 

   तो हम कहना ये चाहते हैं कि -मुंबई महानगर की जीवन रेखा "मुंबई की लोकल ट्रेन" ये सिर्फ एक सवारी गाड़ी नहीं है जो यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक किफायती सफर कराती है बल्कि ये पटरियों पर दौड़ता हुआ एक शहर है। जिसमे सफर करना और सहयात्रियों के साथ निभाना भी एक कला है। यदि आप इस कला से वाकिफ नहीं है तो आपके लिए सफर दुस्कर ही नहीं होगा बल्कि एक दुःस्वप्न साबित होगा। 

 एक दिन मैंने भी किया था इस "मुंबई लोकल ट्रेन" में ऐसा सफर जो भुलाये नहीं भूलती।  

    मुंबई जाने के बाद सबसे ज्यादा उत्साहित मैं दो चीजों के लिए थी पहले मरीन ड्राइव जाने के लिए और दुसरा लोकल ट्रेन में सफर करने के लिए और ये दिनों काम हमने एक ही दिन किया।उस वक्त हम मीरा रोड में रहते थे। मेरी बेटी के कुछ दोस्त भी साथ रहते थे।हम दिन के 11-12 बजे के बीच निकलते और रात को 11-12 बजे ही लौटते।हम लोकल से कहीं भी जाते तो इसी टाइम टेबल से।उस वक्त भीड़ थोड़ी कम होती थी ‌। वैसे तो कई बार इस टाइम पर भी ज्यादा भीड़ का सामना करना पड़ा था,कई बार मैं भीड़ में दबी भी थी,कई बार मेरा ही दुपट्टा मेरे ही गले को जकड़ लिया करता था, लेकिन बेटी के लड़के दोस्त मुझे बचा लिया करते थे। मेरी बेटी के दोस्तों से मेरा रिश्ता बड़ा परफेक्ट है। एक तरह से मैं जगत माता हूँ यानि सबकी माँ और एक अच्छी दोस्त भी।सब मेरे साथ बहुत खुश भी होते हैं और मस्ती भी करते हैं।इस लिए वो जहाँ जाते तो मुझे साथ लेकर ही जाते और हम जहाँ भी जाते ज्यादातर लोकल से ही जाते।इस तरह मुझे लगता था कि लोकल ट्रेन के सफर का अनुभव हो गया था मुझे। लेकिन मैं ग़लत थी असली अनुभव होना अभी बाकी था।

     किस्सा तब शुरू होता है जब मुंबई से मेरी वापसी थी। मेरी ट्रेन बांद्रा टर्मिनस से थी। मीरा रोड से बांद्रा टैक्सी में जाना काफी खर्चीला था और लोकल से कुल मिलाकर कर 50-60 रुपए। मैंने थोड़ी कंजूसी की। बेटी का एक लड़का दोस्त जिसका नाम रजत है उसने भी मेरा साथ दिया।(रजत हमें बांद्रा तक छोड़ने आ रहा था) जबकि बेटी राज़ी नहीं थी। सफर में सावधानी बरतते हुए हमने टाइमिंग वही 11 बजे का तय किया। हमारी ट्रेन शाम को 4 बजे थी और हम 11 AM तक मीरा रोड के स्टेशन पर थे। हमारे पास 5 घंटे थे और सफर था बस 45-50 मिनट का। अपनी तरफ से पूरी होशियारी की थी हमने लेकिन मुंबई लोकल ने भी ठान रखी थी कि" वापस जा रही हो तो मेरे असली सफर की यादें तो साथ लेती जाओं"

    11 बजे से खड़े-खड़े 12 बज गए लेकिन एक भी ट्रेन में घुसने की गुंजाईस नहीं थी इतनी खचाखच भरी हुई थी। हमारे पास ज्यादा तो नहीं मगर सामान था एक बड़ा ब्रीफकेस और दो छोटे-छोटे बैग। ब्रीफकेस रजत के हाथ में था और बैग हम दोनों माँ-बेटी के हाथ में। जब 12 बज गए तो रजत ने कहा-आंटी हम उल्टी दिशा का ट्रेन पकड़ते हैं  यानि विरार के तरफ चलते हैं। क्योंकि उधर की ट्रेन थोड़ी खाली आ रही थी, विरार से फिर वही ट्रेन वापसी आती है। हमने जोड़-घटाव किया कि -विरार पहुंचने में आधा घंटा और फिर वहाँ से बांद्रा एक डेढ़ घंटे, कुल मिलकर हम दो घंटे में बांद्रा पहुंच जायेगे और हमारे पास अभी चार घंटे है। अच्छी तरह समझ-बूझकर हम विरार की ओर चल पड़ें। लेकिन पता नहीं था कि आगे क्या होने वाला है। 

    हमारी ट्रेन किसी कारणवश विरार ना जाकर उससे पहले वसई रोड के एक सुनसान स्टेशन पर जाकर रुक गई,पता चला ये ट्रेन नहीं जाएगी मुख्य स्टेशन से दूसरी ट्रेन पकड़ना होगा। और मुख्य स्टेशन की जो हालत थी उसे दूर से देखकर ही हमारे पसीने छूट गए। लेकिन दूसरा कोई रास्ता नहीं था अब यहाँ से टैक्सी पकड़ने का मतलब कि हम वक़्त पर पहुँचेगे या नहीं कोई गारंटी नहीं थी,हमें किसी भी तरह लोकल ही पकड़नी पड़ेगी। हर पाँच-दस मिनट के अंतर् पर आने वाली लोकल किसी कारणवश एक घंटे बाद आई। इन सब चक्करों में 1. 45 हो गया था तो जो ट्रेन आने वाला था उसे हमें किसी भी हाल में पकड़ना ही था। रजत ने कहा-आंटी आप दोनों लेडीज डब्बे में चढ़ जाए और मैं सामान वाले में चढ़ जाऊँगा। ये राय कर हम ट्रेन आते के साथ एक्शन में आ गए। रोज सफर करने वाले लोगों के आगे हम माँ-बेटी का टिकना एक जंग के सामान था। ट्रेन पर चढ़ते वक़्त वहाँ कोई किसी पर जल्दी मुरव्वत  नहीं करता। हम माँ-बेटी जैसे-तैसे ट्रेन में घुस गए। रजत के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी। ट्रेन चल पड़ी मैंने उसे जोर से आवाज लगाकर ब्रीफकेस पकड़ाने को कहा वो बेचारा चलती ट्रेन के साथ दौड़ता रहा मगर  ब्रीफकेस पकड़वाने में असफल रहा। 

    खैर,हम तो ट्रेन में और सामान छूट गया। थोड़ी देर बाद रजत का कॉल आया कि-10 मिनट में  ट्रेन आ रही है मैं वो पकड़ लूँगा आप चिंता ना करें ,सुनकर थोड़ी राहत हुई। दिल्ली के लिए हमारी ट्रेन 3. 50 में थी और हम बांद्रा पहुँच रहे हैं 3. 40 में। रजत का कोई अता-पता नहीं, फोन आने के बाद से ही उसका फोन स्वीचऑफ जा रहा था। लोकल से उतरते ही एक और आफत हमारा इंतज़ार कर रही थी। लोकल में सफर के दौरान कभी भी T.C से हमारा सामना नहीं हुआ था। मगर उस दिन उतरते ही T.C ने हमें पकड़ लिया और सीधे 1000 रूपये का जुर्माना कर दिया। हमारी लोकल की टिकट तो रजत के पास थी।  मैंने उस T.C को समझाने का बहुत प्रयास किया, दिल्ली की टिकट भी दिखाई मगर वो मानने को राजी नहीं थी। तभी किसी अनजाने नंबर से कॉल आया मुझे समझ आ गया कि वो रजत का है। रजत का ही था उसने कहा -आंटी मेरा अब वहाँ तक पहुँचना ना मुमकिन है मैं बोरीवली स्टेशन पर रहूँगा और आपका सामान दे दूँगा। ( हमें पता ही नहीं था कि-ट्रेन बोरीवली भी रूकती है ) मैंने उस T.C की बात रजत से कराई तब वो हमें छोड़ी फिर हमने उसी से बांद्रा टर्मिनस की ओर निकलने का रास्ता पूछा (क्योंकि हम तो रजत के भरोसे थे हमें पता  ही नहीं था रास्तों का)भागते दौड़ते स्टेशन से बाहर निकले तो पता चला कि-बांद्रा टर्मिनस स्टेशन यहाँ से दूर है। एक टैक्सी वाले से पूछा तो उसने कहा-"100 रुपया लूँगा..मैडम जल्दी सोच लो राजधानी निकलने में बस दो मिनट बाकी है....गारंटी है कि ट्रेन पकड़वा दूँगा।" अब मरता क्या नहीं करता एक सकेंड भी गवाए बिना मैं टैक्सी में बैठ गई। जब हम पहुंचे तो दंग रह गए क्योंकि वहाँ तक पैदल मात्र 5 मिनट का रास्ता था। खैर,टैक्सी ड्राईवर ने अपना वादा निभाया बिल्कुल ऐसी जगह उतारा जहाँ से चंद सीढियाँ उतरते ही ट्रेन सामने थी। ड्राईवर को पैसा पकड़ते हुए हम भागे ट्रेन धीमी रफ्तार से चल पड़ी थी लेकिन दरवाजे पर खड़े एक आदमी ने हमारी मदद की। हाथ बढ़ाकर सामान भी पकड़ा और हमें भी चढ़ने में सहायता की। हाँफते हुए हम अपनी कम्पार्टमेंट की ओर भागे क्योंकि करीब 10 बॉगी के बाद हमारा बॉगी था और ट्रेन आधे घंटे में बोरीवली पहुँच जाती और रजत तो हमें हमारी ही बॉगी में ढूँढ पाता। बोरीवली में रजत हमें मिल गया उसने हमें हमारा सामान दे दिया,उसी ने हमें एक ठंडे पानी की बोतल भी दी। हम माँ-बेटी चैन की साँस लिए...इस भाग-दौड़ में हमारा गला सुखकर काँटा हो चूका था...हमने सर्दी-जुकाम की परवाह किये बगैर फटाफट  बोतल खोला  और अपने गले में उढ़ेल लिया.....फिर अपनी-अपनी सीट पर पसर गए....होश ही नहीं आ रहा था....सबकुछ सपने सा था....ऐसा लग रहा था अभी आँख खुलेंगी और हम खुद को अपने घर में सुरक्षित पाएंगे। आधी घंटे कोई किसी से बात नहीं किया। इस बीच दिल्ली से घर वालों का कॉल पर कॉल आये जा रहा था। खुद को थोड़ा रिलैक्स करने बाद सबको फोन किया मगर बताये कुछ नहीं,घर पहुँचकर ही सबको सारी बात बताई। 

    अब ये तो हमारा किस्सा था रजत की कहानी तो अभी बाकी थी उसके साथ किया हुआ था ये बताएं बिना तो ये सफरनामा ख़त्म ही नहीं हो सकता। रजत ने कहा तो था कि 10 मिनट में ट्रेन आएगी मगर ट्रेन 45 मिनट बाद आई। ट्रेन के देर-देर से आने के कारण भीड़ बढ़ता  रहा था। बड़ी मुश्किल से रजत सामान वाले कम्पार्टमेंट में चढ़ पाए था। वो भी बड़ी विकट अवस्था में,उसके एक हाथ में ब्रीफकेस था और दूसरे हाथ से वो दरवाजे का रॉड पकड़कर लटका हुआ था यानि ब्रीफकेस हवा में झूल रहा था वो खुद भी पूरी तरह बाहर की ओर लटका हुआ था।  किसी ने   सामान तक को पकड़ने में उसकी मदद नहीं की थी। ये बात रजत ने दो दिन बाद फोन पर बताया था। उसने आगे जो बताया वो इतना डरावना था कि मैं आज  भी उस दृश्य  के कल्पना  मात्र से घबड़ाने लगती हूँ,उस बच्चें ने तो सहा था। वसई रोड से बांद्रा करीब एक-सवा घंटे का रास्ता है उतना दूर वो एक भरी ब्रीफकेस को पकडे हुए लटकता रहा था जब बिजली का खम्बा आता था तो उसे खुद को बचाने के लिए सिकोड़ना भी पड़ता था। ट्रेन लेट-लेट से आने के कारण चढ़ने वालों की ही संख्या थी उतरने वालो की नहीं,जब ट्रेन किसी स्टेशन पर रूकती तो एक मिनट के लिए उसके हाथों को आराम मिलता और फिर वही हालत। (इस वजह से महीनो तक उसके दोनों हाथ की कोहनियों में दर्द रहा) ये सब सुनकर मैंने उसे बहुत डाँटा-"मुर्ख लड़के सामान नहीं आता तो कोई प्रलय नहीं आ जाता अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो मैं ताउम्र जीते जी मरे के समान रहती" मेरी डांट सुनकर वो बोला-हाँ,आंटी मुझ से गलती हो गयी थी,मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। उसका फ़ोन भी किसी कारणवश स्वीचऑफ हो गया था तो वो बड़ी मिन्नत कर किसी से फ़ोन लेकर मुझे कॉल किया था। आज भी मैं जब इस घटना को याद करती हूँ तो खुद से ज्यादा रजत के लिए डर जाती हूँ....भगवान को लाख-लाख धन्यवाद करती हूँ कि-"आपने मेरे बच्चें की जान बचा ली उस दिन"  वरना एक माँ को क्या जबाब देती मैं और खुद को भी....हम माँ-बेटी के सफर में कोई जोखिम नहीं था मगर रजत का सफर जोखिमों से भरा था जो कि उसे नहीं करना चाहिए था,सामान छूट भी जाता तो कोई बड़ा मसला नहीं था।आज की युवा पीढ़ी उतावलेपन में कुछ करने से पहले सोचती ही नहीं है। लेकिन उस दिन के बाद रजत ने कसम खाई कि-"ऐसा जोखिम कभी नहीं उठाऊंगा और बिना सोच-विचार किये कुछ नहीं करूँगा।" साथ ही साथ हम तीनो ने ये कसम खाई कि-"कभी भी ट्रेन या फ्लाईट पकड़ने के लिए लोकल ट्रेन से सफर नहीं करेंगे"

    इन सब के वावजूद अगर आप मुंबई गए और लोकल ट्रेन का मज़ा नहीं लिया तो समझिये आपका मुंबई घूमना पूरा नहीं हुआ। अरे भाई, बदहवास भीड़ को देखकर यदि ट्रेन में चढ़ने की हिम्मत नहीं हुई तो कोई बात नहीं काम से काम स्टेशन पर बैठकर उन भागती-दौडती जिंदगियों को तो देख सकते हैं यकीन मानिये -"आप एक बार जिंदगी को नये सिरे से सोचने को मजबूर हो जायेगे "

गुरुवार, 2 जून 2022

"मुंबई की पहली बारिश"



  कभी-कभी ऐसा भी होता है कि चंद मिनटों का सफर..कई घंटो का हो जाता है,इतना ही नहीं सरल सा रास्ता भी मुश्किलों से भरा हो जाता है,ऐसा ही एक सफर तय किया था मैंने आज ही के दिन "2 जून" को। 

    बात उन दिनों की है जब आज से चार साल पहले मैं पहली बार मुंबई आयी थी। मुझे आए हुए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था। मायानगरी की अदाओं से मैं अभी बिल्कुल अनजान थी, इसके मिजाज के बारे में थोड़ा बहुत सुना पढ़ा तो था मगर अनुभव के नाम पर सब जीरो था। ना रास्तों का ढंग से पता था ना ही बाजार-हाट का, ना ही किसी व्यक्ति विशेष से परिचय था। पहचान के नाम पर हमारी एक बुजुर्ग हाउस ऑनर थी जो मराठी थी ना उनकी कोई बात मेरी समझ में आई ना ही मेरी कोई बात उनके पल्ले पड़ती बस, दुआ सलाम तक ही बातें होती थी।

    एक सप्ताह तो घर की सारी व्यवस्था में ही लग गया। हम माँ-बेटी ही थे कोई सहयोगी भी नहीं था तो हमें बहुत सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा जो कि अक्सर नए शहर में जाने पर होता ही है, इसके लिए हम माँ-बेटी मानसिक रूप से पहले से ही तैयार थे। 15 दिन में हम एडजेस्ट कर गए थे। फिर बेटी काम की तलाश में ऑडिशन देने जाने लगी,साथ में मुझे भी जाना होता क्योंकि नया शहर होने के कारण थोड़ा मैं भी ड़रती थी थोड़ी वो भी झिझकती थी। लेकिन उसके साथ मेरे जाने का  सिलसिला भी जल्दी ही ख़त्म हो गया बहुत जल्द बेटी अकेले आने-जाने लगी। अब समस्या मेरी हो गई क्या करूँ मैं...पुरे दिन घर में अकेली। तो ढूंढ़ते-ढूंढते एक पार्क मिल गया और मुझे इस पार्क का सहारा। मेरा ये ब्लॉग का सफर भी इसी पार्क से शुरू हुआ था। घंटे दो घंटे बैठती थी जो विचार उमड़ते उन्हें मोबाइल में नोट कर लेती, थोड़ा दिल भी बहल जाता और खुली हवा में सांस लेने को भी मिल जाता वरना, मुम्बई के माचिस के डिब्बियों जैसे घर में दम घुटने लगता था।

  रोज तो नहीं मगर जब भी मेरा दिल नहीं लगता, मन उदास हो जाता तो मैं इसी पार्क में आकर बैठ जाती थी । ऐसा ही एक दिन था "2 जुन मेरी शादी की सालगिरह का दिन"। पहली बार आज के दिन घर-परिवार से भी दूर थी और पतिदेव से भी। बेटी का भी उसी दिन एक जरूरी वर्कशॉप का क्लास था उसका जाना जरूरी था वो सुबह 8 बजे ही निकल गई।पुरे दिन की तनहाई और घर का खालीपन मेरे लिए असहनीय हो रहा था। गर्मी बहुत थी तो दिन तो जैसे-तैसे गुजार लिया शाम होते ही मैं पार्क के लिए निकल पड़ी जो घर से महज़ आधे किलोमीटर की दुरी पर ही था। बेटी घर से जाने के बाद बस एक बार दोपहर में कॉल की थी तो बोली कि बस एक घंटे में घर आ जाऊँगी। उसके बाद उसने कोई कॉल नहीं किया मैं जब भी फोन करूँ तो फोन स्विच ऑफ मिलता रहा।  पहली बार वो मुम्बई में घर से इतनी देर बाहर थी।नया शहर और माहौल के कारण दिल में बुरे-बुरे ही ख्याल आ रहें थे।उसका एक दोस्त भी साथ में था उसका फोन भी स्विच ऑफ ही जा रहा था। दोस्त भी कोई बहुत दिनों का परिचित नहीं था सो मन कभी-कभी अनजान शंकाओं से भर जा रहा था। क्या करें "हम बेटियों की मायें कभी अच्छा सोच ही नहीं पाती, हर वक़्त दिल में एक डर जो घेरे रहता है"। 

   खैर, मैं पार्क में बैठी खुद को बहलाने की कोशिश में लगी थी। ऐसे वक्त में अक्सर ऐसा भी होता है कि आप जिसे भी फोन करो वो फोन नहीं उठाता।कभी-कभी ऐसी भी परिस्थिति बनती है जब आप किसी को बात करने के लिए ढुंढते है और आप को कोई भी नहीं मिलता। मेरे साथ भी उस दिन कुछ  ऐसा ही हो रहा था।शाम के  7.30 बज गए, हल्का अँधेरा छा रहा था तभी अचानक से बादल उमड़-घुमड़ के आ गए और तेज हवा चलने लगी। मैं तेज क़दमों से घर के लिए निकल पड़ी सोचा मैं तो घर पहुँचू....क्या पता बेटी घर पहुँच गई हो...उसके फोन की बैटरी ख़त्म हो गई हो...यही सब सोचते-सोचते मैं घर की ओर बढ़ रही थी कि यकायक तेज बौछारों के साथ बारिश शुरू हो गई। अचानक से इतनी तेज बारिश की मैंने कल्पना भी नहीं की थी। फिल्मों में देखती थी कि हीरो-हीरोइन घूम रहें है और अचानक बिजली कड़कने लगी तेज बारिश शुरू हो गई...ऐसा देख हम सब खूब हँसते थे कि-मुम्बईया फिल्मों में हीरो-हीरोइन के मिलते ही अचानक से बारिश कैसे आ जाती है? लेकिन आज ये मेरे साथ सच में हो रहा था, ये अलग बात थी कि-मेरे साथ मेरा हीरो नहीं था।

  खैर,तेज बारिश में भीग तो गई थी मगर तेज हवाओं के साथ गिरती बौछारों से ऐसा लग रहा था कि वो मुझे उड़ा कर ही ले जाएगी तो, खुद को बचाने के लिए मैंने एक छोटे से चर्च के सेड में छुप जाना बेहतर समझा सोची, बारिश थोड़ी देर में तो रुक ही जाएगी फिर चली जाऊँगी। (मुंबई में जगह-जगह छोटे-छोटे ओपन चर्च मिल जाते हैं)लेकिन बारिश थी की रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। मेरा दिल बहुत घबराने लगा ऊपर से बेटी की चिंता और ज्यादा सता रही थी समझ ही नहीं आ रहा था कि किसको फोन करूँ किससे सहायता मांगू। बस,भगवान से गुहार लगा रही थी कि मेरी बेटी जहाँ हो सुरक्षित हो। घर पर भी किसी को फोन नहीं कर सकती थी वो दिल्ली में बैठे क्या करते अलबत्ता घबरा और जाते,सो अपनी पीड़ा अकेले ही सह रही थी। बारिश की बौछार इतनी जबरदस्त थी कि एक घंटे के अंदर पूरा सड़क तालाब बन गया। उन दिनों हम "वर्सोवा गांव"(अंधेरी) के इलाके में रहते थे। उस बस्ती में गंदगी बहुत थी तो बारिश के पानी में कीड़े-मकोड़े तैरने लगे। मैं जहाँ खड़ी थी वहाँ भी जब मेरा पैर एक फीट पानी में डूब गया तो मैंने सोचा अब यहाँ रुकने से बेहतर है मैं इसी पानी में गिरते-पड़ते ही सही घर पहुँचु। अभी सोच ही रही थी कि -फोन की घंटी बजी देखा तो पतिदेव का फोन था फोन उठाते ही उन्होंने कहा  "Happy anniversary" मैं इधर से रुआंसी होकर बोली - "Happy anniversary" बहुत मुश्किल से मैं अपना रोना रोक पा रही थी लेकिन, उन्हें समझ आ गया वो बोले क्यूँ रो रही हो...अगले साल फिर एक साथ होंगे...बहुत तेज़ आवाज़ आ रही है कहाँ हो तुम। (अब उन्हें कौन बताए कि-मेरे रोने की वजह वो नहीं है जो वो सोच रहें हैं ) मैंने झूठ बोला कि-बहुत तेज़ बारिश हो रही है मैं बालकनी में हूँ न इसीलिए आवाज़ आ रही है,कैसे बताती कि मैं फंसी हूँ मुसीबत में। अभी पतिदेव से बात कर ही रही थी कि बेटी का फोन आया मैंने झट फ़ोन ये कहते हुए डिस्कनेक्ट किया कि-बाबू का फोन आ रहा है...बाद में बात करती हूँ। दूसरी तरफ से बेटी की आवाज सुनकर मेरी जान में जान आयी। उसने कहा-मम्मा मैं बिलकुल ठीक हूँ... घबराना नहीं मैं बारिश में फंसी हूँ...कोई ऑटो भी नहीं मिल रहा है....घर आकर सारी बात बताऊँगी...तुम परेशान नहीं होना...तुम कहाँ हो .....?? मैंने उसे भी वही  जबाब दिया जो पतिदेव को दिया था। अगर बता देती तो अब बेटी मेरे लिए घबरा जाती। 

  खैर,जैसे-तैसे,गिरते-पड़ते मैं घर पहुँची। उस पानी भरे नालीनुमा सड़क पर मरे हुए चूहों से लेकर,मछलियाँ, कीड़े-मकोड़े सब तैर रहे थे मैंने किसी पर ध्यान नहीं दिया...लक्ष्य एक ही था बस,कैसे भी घर पहुँच जाऊँ। ऐसा नहीं था कि-उस सड़क पर मैं ही अकेली चल रही थी मेरे साथ बहुत से लोग चल रहें थे मगर,वो मुंबई के इस हालात के आदी थे उन्हें कोई खास फर्क ही नहीं पड़ रहा था और मेरे लिए तो वो "बैतरणी" थी जिसे पार करना  एक चुनौती। 7.30 की पार्क से निकली 10.00 pm में घर पहुँची। ताला खोल ही रही हूँ कि पीछे से बेटी और उसका दोस्त दोनों आ गए,मेरी ऐसी हालत देख वो अचम्भित हो पूछी -ये क्या हाल हो गया है..कहाँ थी तुम ? मैंने कहा-"अभी कुछ ना पूछो...सैकड़ो कीड़े मेरे जिस्म पर चल रहे हैं...पहले उन्हें हटा लेने दो"। ताला खोलते ही मैं सीधी बाथरूम में भागी। बेटी भी पूरी तरह भीगी हुई थी मेरे बाद वो भी पहले नहाने ही गई। नहाने के बाद मैंने कॉफी बनाई क्योंकि बारिश में उतना भीगने के बाद कंपकपी सी हो रही थी। तब तक उसका दोस्त भी नहाकर आ गया हम तीनों कॉफी पीते-पीते अपनी अपनी आपबीती सुनाने लगे।

   बेटी ने बताया कि-क्लास तो तीन बजे तक ही था लेकिन जैसे ही क्लास खत्म हुआ थियेटर जगत के एक बड़े एक्टर आ गए, ऑर्गनाइजर ने कहा कि-आप यदि इनका वर्कशॉप अटेण्ड करना चाहे तो कर सकते हैं। कोई चार्ज तो था नहीं सो हम बहुत ज्यादा ही खुश हो गए और क्लास  में चले गए उन लोगो ने हमारा फोन स्विच ऑफ करवाकर पर्स बाहर ही जमा करवा दिया, अत्यधिक उत्साह में हम दोनों आपको बताना ही भूल गए और एक बार अंदर चले गए तो बाहर नहीं आ सकते थे। बेटी का दोस्त जिसका नाम अंकित था उसने मुझे संतावना देते हुए कहा-"आंटी क्यूँ घबरा जाती हो....दामिनी मेरी बहन जैसी है...मैं जब इसके साथ रहूँ तो आप बेफिक्र रहो करो....आपकी बेटी को कही अकेला नहीं छोड़ूँगा"। उसकी  ये बातें सुन मैंने उसे गले लगा लिया आज भी वो मेरी बेटी का भाई ही है,अब तो वो मुंबई में नहीं रहता मगर रिश्ता नहीं तोडा है। मैं सोचती हूँ कि-आज के खराब माहौल में हम अच्छे लोगों पर भी शक करने लगते हैं,लेकिन जब तक किसी के साथ वक़्त नहीं बिताओं कैसे पता चलेगा कि-कौन अच्छा,कौन बुरा। 

   खैर,उसे जब पता चला कि आज मेरी शादी की सालगिरह है तो उसने भी मुझे विश किया। घर में ज्यादा कुछ तो था नहीं तो बस,पूरी और आलू की सब्जी बनाई और तीनो साथ बैठकर खाना खाये। ये सब करते-करते रात के एक बज गए थे। पतिदेव से दुबारा बात भी नहीं हुई। बस,ऐसे ही मनाया मैंने "मुंबई की पहली बारिश में अपनी शादी की सालगिरह"। रात को बिस्तर पर लेटे-लेटे मैं सोच रही थी कि-माँ ठीक ही कहा करती थी "सफर छोटा हो या बड़ा उसका रास्ता अनिश्चित ही होता है"। आज शाम 6 बजे जब मैं घर से निकली थी तो आसमान बिल्कुल साफ़ था मैंने कल्पना भी नहीं किया था कि-मेरा ये छोटा सा टहलने जाने वाला सफर भी इतना "Adventures" हो जायेगा। 

सच,"ना जिंदगी का पता है ना सफर का" सब कुछ अनिश्चित। 

बुधवार, 2 जून 2021

"सच्चे हमसफ़र..... "

   


    बात उन दिनों की है जब मेरी शादी को बस दो साल हुआ था ,मेरी गोद में 9-10 महीने की बेटी थी जिसकी तबियत बहुत ज्यादा खराब थी और उसे ही डॉक्टर से दिखाने के लिए हम बीरगंज (नेपाल, जहाँ मैं व्याह कर गई थी ) से मोतिहारी  (पश्चिमी चम्पारण,बिहार  जहाँ मेरे माँ-पापा रहते थे ) जा रहें थे। नेपाल बॉर्डर पार कर रक्सौल पूर्वी चम्पारण से हमें ट्रेन पकड़ना होता था। जब हम रक्सौल पहुंचे तो देर हो गई थी और ट्रेन खुलने ही वाली थी (बॉर्डर पार अक्सर जाम होता था,कभी-कभी कई-कई घंटे लग जाते थे,उस दिन भी कुछ ज्यादा ही जाम था ) हम भागते-भागते ट्रेन में चढ़ गए मगर टिकट नहीं लिए थे ,तभी किसी कारण से ट्रेन थोड़ी देर रुक गई ,मेरे पतिदेव ने मेरी एक ना सुनी और वो टिकट लेने के लिए  ट्रेन  से उतर गए। टिकट काउण्टर पर भी लम्बी लाईन लगी थी। पतिदेव के जाने के दो मिनट बाद ही ट्रेन चल पड़ी। खिड़की से झाँकते हुए मेरी नज़र बेसब्र हो उन्हें ढूँढने लगी लेकिन दूर-दूर तक वो दिखाई नहीं दे रहें थे। ट्रेन  खुलते के साथ ही मेरी बेटी जोर-जोर से पापा-पापा  चिल्लाते  हुए रोने लगी ,वो  खिड़की से दोनों हाथ बाहर कर तड़प-तड़प कर रो रही थी। मैं उसे संभालने लगी तभी प्लेटफॉर्म पर शोर हुआ "अरे ,कोई आदमी ट्रेन से गिर गया "शोर सुनते ही सब खिड़की-दरवाजे से बाहर लटकते हुए झाँकने लगे,मैं अपनी सीट पर बैठी, बेटी को कसकर पकडे हुए ये प्रार्थना करने लगी "प्रभु वो आदमी जो भी हो उसकी रक्षा करना, उसे अपने परिवार वालों तक सही सलामत पहुँचा देना " प्रार्थना करते-करते मेरी आँखों से आँसू बहने लगे,मेरी बेटी जब पांच छह महीने की थी तभी से वो मेरी आँखों में आँसू नहीं देख पाती थी मेरी आँखों में आँसू देखते ही वो रोना भूलकर मेरे आँसू पोछने लगती थी (अब इतनी छोटी बच्ची ऐसा क्यूँ करती थी वो तो परमात्मा ही जाने ) उस दिन भी वही हुआ वो रोना भूल मेरे आँसू पोछने लगी। गाडी रफ्तार पकड़ चुकी थी ,एक उम्मींद थी कि पतिदेव शायद किसी और कम्पार्टमेंट में चढ़ गए होंगे परन्तु इस बात की पुष्टि तो अब अगले स्टेशन पर ही होगी। 

    सच ही कहते हैं "अकेली औरत खुली तिजोरी की तरह होती है " उसे देखते ही चारो तरफ से लुटेरे आ धमकते हैं, मेरे साथ भी वही हुआ। मेरे बहुत से शुभचिंतक मेरे इर्द-गिर्द खड़े हो गए "कहाँ जाना है मैडम....पतिदेव छूट गए क्या......हमें बताइए हम आपको छोड़ देंगे.....आप बिलकुल ना घबराइए मैं हूँ न " ऐसे-ऐसे जुमले चारों तरफ से मेरे कानों में पड़ने लगे। कोई मेरी बेटी को पुचकार रहा है तो  कोई टॉफी दे रहा है। मेरी बेटी हर एक का हाथ झटक दे रही थी। बेटी की इस हरकत को देखते ही मेरे अंदर का डर (जो सिर्फ इस वजह से था कि -कही इनके साथ कुछ बुरा न हुआ हो,अन्यथा डरना तो मैंने सीखा ही नहीं, ना तब ना अब ) गायब हो गया, मैं खुद को संभालते हुए बोली -" आप लोगो चिंता ना करे......मैं अकेली ही जाने वाली थी.....पतिदेव तो सिर्फ बैठाने आये थे... हाँ,टिकट उनके पास रह गया है....मगर मेरे पास पैसे है....आप लोगो को परेशान होने की जरूरत नहीं है।" मेरे सब कुछ कहने के वावजूद.....कुछ कुत्ते ढीढ होते है न....मांस का टुकड़ा आसानी से अपने हाथो से जाने नहीं देना चाहते... वो बातचीत करने का सिलसिला जारी रखे थे, पर मैं भी ऐसे कुत्तों से डरने वाली तो थी नहीं, मैं भी आराम से उनके सवालों का जबाब दे रही थी। कहाँ तक जाना है मैडम ....ज्यादा दूर नहीं बस मोतिहारी जाना है। अच्छा, मैं भी मोतिहारी ही उतरुँगा....कोई दिक्क्त नहीं आप मेरे साथ हो लेना ---हाँ-हाँ जरूर,आप तो भले आदमी लग रहें है। दूसरी आवाज आई---अरे मैडम,मोतिहारी में किसके घर जाना है.....मैं सबको जनता हूँ---इस सवाल पर मैंने थोड़ी समझदारी दिखाई और अपने पापा का नाम ना लेकर बोली- अरे भाईसाहब, मुझे छेदी प्रसाद के घर जाना है.... मैं उनकी भतीजी हूँ.....आप तो मेरे चाचा को अच्छे से जानते होंगे न....मोतिहारी में ऐसा कोई नहीं जो उन्हें ना जाने....आप मुझे घर पहुंचा दीजियेगा.....चाचा बहुत खुश होंगे आपसे शायद, ईनाम भी देदे आपको। छेदी प्रसाद का नाम सुनते ही सबके तोते उड़ गए,कोई दबी हुई आवाज में तो कोई मुस्कुरा कर बोलने लगा -अच्छा तो आप छेदी प्रसाद की भतीजी है,एक जनाब तो गले को साफ करते हुए निकल लिये। एक-एक करके सब गदहे की सींग की तरह गायब होने लगे। छेदी प्रसाद हमारे पडोसी थे जो मोतिहारी में " दबंग " के नाम से जाने जाते थे। हमारे घर से उनका बहुत ही अच्छा रिश्ता था और अब भी है। मेरे माँ-पापा थे ही ऐसे जो खुद तो बड़े सीधे थे मगर बनती उनकी सबसे थी,सब पापा की बहुत इज्जत करते थे।

     अगले स्टेशन पर भी पतिदेव नहीं आये मुझे समझ आ गया कि -ये सफर मुझे अकेले ही तय करना है। ख़ैर, छेदी प्रसाद का नाम सुनते ही चील-कौओं का मड़राना तो बंद हो गया मगर मेरी फ़िक्र और परेशानी कैसे कम होती, मेरी  गोद में एक बच्ची,एक हैंडबैग और एक सूटकेस  ये सब लेकर मैं स्टेशन पर उतरूंगी कैसे,  गाड़ी भी बस दो  मिनट रूकती है। कहते हैं न जहाँ बुरे लोग है वहाँ अच्छो की भी कमी नहीं,स्टेशन आने पर एक भलामानस जो शुरू से ये सब देख रहा था मगर चुप था उसने हाथ बढ़ते हुए कहा " May I help you "मैंने भी स्वीकृति में सर हिला दिया। उसे भी वही उतरना था तो ज्यादा परेशानी  नहीं हुई,मेरे कहने पर वो मेरे सामान को प्लेटफॉर्म की दूसरी ओर रेलवे लाईन पार करते ही जहाँ मेरे पापा का ऑफिस था वहाँ तक पंहुचा दिया। मैंने उसे थैंक्स कहा और वो भी बड़े ही शालीनता के साथ हाथ जोड़कर चला गया। पापा के ऑफिस पहुँचकर मुझे चैन मिला,अब घर पहुँचने की फ़िक्र नहीं बस, इनकी चिंता हो रही थी। जब से सुना था कि -ट्रेन से कोई गिर गया है अंदर तक एक घबड़ाहट झकझोर रहा था,दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था जैसे मुँह को आ जायेगा,बस ऊपर-ऊपर से तो सहज बनी रही और हर पल भगवान से प्रार्थना करती रही "वो बिल्कुल ठीक होंगे"। मेरे ट्रेन के तीन  घंटे बाद एक ट्रेन  थी, मुझे यकीन था वो उसी ट्रेन से तीन घंटे बाद मुझ तक जरूर पहुँचेगे। 

    खैर,अभी की परिस्थिति पर पहले फोकस करना था--ये सोच मैं पापा के ऑफिस में गई,अंदर जाने पर पता चला कि -पापा तो ऑफिस आये ही नहीं ,वो तो एक सप्ताह से ऑफिस नहीं आ रहें हैं। इतना सुनते ही मेरे पैरों के नीचे से जमीन निकल गई---ऐसा कैसे हो सकता है---क्या हुआ होगा पापा को---क्यूँ छुट्टी लिए है ? ऐसे कई सवालों ने मुझे घेर लिया। उस दिन ऑफिस में मुझे एक भी पहचान के लोग नहीं मिले जिनके साथ मैं घर तक  जाती और अंजानो का साथ मैं लेना नहीं चाह रही थी। उस शहर की सबसे बड़ी खराबी थी वहां जल्दी रिक्सा नहीं मिलता था,घर तो लगभग एक किलोमीटर से भी कम की दुरी पर था मगर उतना दूर भी सामान और बच्चें को लेकर मैं कैसे चल पाऊँगी। वैसे भी बेटी के होने के बाद से मैं बहुत कमजोर हो गई थी, चलने पर ही साँस फूलती थी,ऊपर से बेटी सीजीरियन हुई थी तो भारी समान लेकर चलना और मुश्किल था, मेरी बेटी का वजन भी तो  10 किलो था, मेरे तो पसीने छूटने लगे। मगर करती क्या,आज के जमाने की तरह मोबाईल तो था नही कि -एक बटन दबाओं और सारी समस्याओं का समाधान हो जाए। मेरे पास विकल्प तो था नही सो "चल अकेला "कहते हुए इस उम्मींद पर चल पड़ी कि -रास्ते में कोई तो पहचान का मिल जाएगा लेकिन,  उस दिन मेरी किस्मत शायद बहुत खराब थी, कोई नहीं मिला। 

     अब उस दिन, मेरी किस्मत बहुत खराब थी या बहुत अच्छी वो तो सफर ख़त्म होने के बाद ही पता चलता। खैर, रुक-रुककर,दम भरते हुए मैं किसी तरह घर पहुँची। सामान नीचे रखकर दरवाजा खटखटाने ही वाली थी कि -देख रही हूँ " दरवाजे पर बड़ा सा ताला लटका " अब तो मेरी क्या दशा हुई होगी ये बताने की जरूरत नहीं। दूसरा कोई रास्ता नही था तो उसी छेदी प्रसाद चाचा के घर का दरवाजा खटखटाया मैंने। चाची ने दरवाजा खोला -मुझे ऐसे हालत में देखते ही वो घबरा गयी,मुझे पकड़कर रोती हुई बोली -"क्या हुआ बेटा,तुम ऐसे हालत में ?"  आप समझ सकते हैं उस ज़माने में बेटियाँ,  बच्चें और सामान के साथ अकेले दरवाजे पर आ खड़ी हो तो क्या गुजरती थी सब पर, असंख्य शंकाये उन्हें घेर लेती थी। मैं रोती उससे पहले चाची ही दहाड़े मारकर रोने लगी। उनका रोना सुन भाभी बाहर आई (छेदी प्रसाद की बहु )वो चाची को मुझसे अलगकर मुझे अंदर लेकर गई....मेरी साँस चढ़ी हुई थी...उन्हेने मुझे पानी पिलाया....बेटी को गोद से लेकर उसे भी बिस्कुट दिया। (जैसा कि -मैंने पहले ही बताया है कि उनके घर से हमारे अच्छे संबध थे,उनकी बेटी नहीं थी तो वो लोगो मुझे संगी बेटी जैसा ही स्नेह देते थे )चाचा भी आ गए आते  सवाल-मेहमान कहाँ है ?

     मुझे जब थोड़ी साँस आई तो मैंने उन्हें सारा वृतांत सुनाया और उन्होंने बताया कि -मेरे नानाजी का देहांत हो गया है और मेरा सारा परिवार वही गया है। उन दिनों घर में फोन तो था नही और नेपाल में भी फोन करने की सुविधा नहीं थी। हाँ,इस  घटना के बाद  मेरे पापा ने घर में फोन लगवा लिया। अब मेरे पतिदेव का क्या हुआ ये जानने के लिए तीन घंटे इंतज़ार करने थे। अब तक तो खुद ही उलझी थी लेकिन अब एक-एक पल सालों के जैसे गुजर रहा था। मैं आज भी शुक्रगुजार हूँ भाभी की जिन्होंने मुझे बड़े प्यार से संभाला। मेरी बेटी  पापा-पापा कहकर सिसकती रही थी,रोने के कारण उसका बुखार और बढ़ता जा रहा था। खैर,8 बजे रात में दूसरी ट्रेन  का टाईम था, 7. 30 में ही भईया (चाचा के बेटे )मेरे पतिदेव को लेने के लिए स्टेशन चले गए। 8. 30 में जब वो वापस आये तो उनके साथ कोई ना था,वो बताए कि -पूरा स्टेशन ढूढ़ लिया मेहमान कही नही मिले,इतना सुनते ही चाची और रोने लगी,चाचा उन्हें समझाने लगे -हो सकता है दूसरी ट्रेन से आये---लेकिन सब जानते थे कि -उसके बाद सुबह तक कोई ट्रेन नही है.मैं अपनी आँसू को छुपाये  बेटी को सभालते हुए खुद को समान्य रखने की कोशिश कर रही थी और मन  ही मन बस प्रार्थना.......... बाहर के बरामदे में सभी  बैठे थे... सब खामोश---तभी छोटा अंकुर चिल्लाता हुआ आया  "फूफाजी आ गए " सब एक साथ दौड़ पड़ें,सबने उन्हें घेर लिया मेरा दिल कर रहा था कि -मैं भी दौड़कर उनसे जाकर लिपट जाऊँ-- मगर उस वक़्त के हमारे संस्कारों ने पैरों में बेड़ियों डाल रखी थी, भाभी मुझे कसकर पकड़कर खड़ी थी और मैं उनके छाती से लगकर फफक कर रो पड़ी,दुःख के आँसू को तो रोक लिया था ख़ुशी के आँसू झलक पड़े। उनकी एक झलक भी नहीं देख  पाई मैं---क्योंकि सब उन्हें घेरे थे। मैं अंदर दरवाजे से लगकर खड़ी थी वो जैसे ही बरामदे में चढ़े मेरी और उनकी निगाहे एक हो गई और दोनों के आँखें  बरस पड़ी । उनके कपडे जगह-जगह से फट्टे थे और गंदगी लगी थी,सर पर पट्टी बंधी थी हाथ-पैरो पर भी गहरे चोट लगे  जख्म दिख रहे थे ,मुझे समझते  देर लगी कि -"ये वही थे जिसके लिए मैंने दुआ की थी "

    हमें रात चाचा के घर ही गुजारनी पड़ी ,रात क्या दो दिन रहना पड़ा जबतक माँ-पापा नहीं आये। वो रात भुलाये नहीं भूलती...बेटी को निमोनिया था वो पूरी रात बुखार में तप रही थी उसे साँस लेने में दिक्क्त होती और पतिदेव को भी अंदुरनी चोट और डर की वजह से बुखार हो गया था। कमरे में आते ही वो मुझे पकड़कर ये कहते हुए फफक-फफक कर रो पड़ें --"आज तो एक पल को लगा जैसे मैं तुमसे हमेशा-हमेशा के लिए बिछड़ गया,मेरा अंत समय स्पष्ट दिख रहा था,यकीनन तुम्हारा  नेक कर्म होगा जिसने मुझे मौत के मुख से निकल लिया। " उसके बाद जो उन्होंने सुनाया उसे यादकर आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि -मैं ट्रेन पकड़ चुका था ,एक हाथ से मैं ट्रेन का दरवाजा पकडे था और मेरा दूसरा हाथ  एक आदमी ने पकड़ रखा था और अंदर खींचने की कोशिश ही कर रहा था तभी diversion पर (जहां ट्रैन पटरी बदलता है ) बहुत तेज झटका लगा और मेरा हाथ  छूट गया और मैं दूर दूसरी पटरी पर फेका गया, गहरी चोट के कारण मुझे बेहोशी सी आ गई थी,मैं उठ नहीं पा रहा था और उस पटरी पर (जिस पर वो गिरे थे )एक मालगाड़ी आ रहा था लेकिन,तभी किसी ने मुझे किनारे की ओर खींच लिया,वही  आदमी मुझे सहारा देकर स्टेशन पर लाया,मुझे पानी पिलाया मेरे जख्मों को भी धोया और पास के मेडिकल स्टोर ले जाकर मेरी मरहम-पट्टी करवाई,तब मैं तुम तक पहुंच पाया हूँ। इतना कहते-कहते वो मुझसे लिपटकर फिर रो पड़ें। 

   सारी रात वो डर-डरकर मेरा साथ पकड़ लेते और मैं पूरी रात कभी बेटी के सर पर ठंडे पानी की पट्टी रखती कभी इनके सर पर। मुझे होमियोपैथ का जितना ज्ञान था और उस वक़्त मेरे पास जितनी दवाईयां थी उससे रात भर दोनों का इलाज करती रही। परमात्मा ने मेरी सुनी और मेरी अगली सुबह रौशनी से भरपूर थी--दोनों का बुखार उतर चूका था,दोनों पापा-बेटी एक दूसरे को गले लगाया चैन से सो रहे थे। सुबह चाय-नाश्ता के बाद हम डॉक्टर के पास दोनों को लेकर गए,क्योंकि दोनों का चैकअप करवाना जरूरी था। चाची और भाभी ने मेरा इतना ख्याल रखा कि-आज तक मैं उनकी एहसानमन्द हूँ। 

    आज इस घटना को तेईस साल हो गए। उस तीन घंटे में हम दोनों ने यही महसूस किया था कि -शायद अब हम एक दूसरे से कभी नहीं मिल पाएंगे,वो तीन घंटे तीन साल की तरह गुजरा था हम पर। मगर ---आज मैं सोचती  हूँ कि -"उस तीन घंटे में हम दोनों एक दूसरे से दूर जा रहे थे या और करीब आ रहें थे ?"

    अरेंज मैरिज की एक खास बात होती है "यहाँ हम एक दूसरे से बिलकुल अनभिज्ञ होते।एक दूसरे से प्यार होने की बात तो दूर एक दूसरे को ठीक से देखे तक नहीं होते हैं और ऐसे में एक दिन हमें एक डोर में बांध दिया जाता है और आज्ञा दी जाती है कि -तुम्हे साथ रहना भी है और निभाना भी। हमारे समय में ऐसी स्थिति में कोई विकल्प नहीं होता था तो पहले ही दिन से मानसिकता ही यही होती थी " तन-मन समर्पण की " तो आधी समस्या यही सुलझ जाती थी। मगर आधी का क्या ? आधी में होता ये है कि -सिर्फ एक दूसरे से अपेक्षा ही रखी गई और अपना-अपना  कर्तव्य नहीं निभाया गया तो जीवन कलह-क्लेश से भर जाता है और यदि छोटे-छोटे मासूम से ख़ुशी और दुःख के पल को संजोया गया और उन पलों में आपसी मतभेद ना कर सीख ले लिया गया तो वही पल एक दूसरे को करीब और करीब लाते जाते हैं। 

    उस दिन के तीन घंटे ने हमें एक दूसरे का मोल समझा दिया था। हमारे रिश्तें में यही होता था जीवन में आये ऐसे पलों ने हमें बहुत कुछ सिखाया और हम एक दूसरे के करीब और करीब आते चले गए...हमनें कभी एक दूसरे पर दोषारोपण नहीं किया ....सफर में जब भी मैं गिरी तो उन्होंने संभाला....वो गिरे तो मैंने अपनी बाँहों का सहारा दिया और जीवन सफर अनवरंत आगे बढ़ता रहा..."25 सावन " कब गुजर गया पता ही नहीं चला.....बस,बालों की सफेदी वक़्त का एहसास करा रही है । हमारे लिए तन की दुरी ने कभी मायने नहीं रखा....आज भी मैं उनसे बहुत दूर हूँ तकरीबन 1415 किलोमीटर दूर मगर सिर्फ तन से मन हरपल एक दूसरे के पास है और हमेशा पास ही रहेंगे। आज ही के दिन वो मेरे "हमसफ़र" बने थे, अब परमात्मा ने कब तक का साथ लिखा है नहीं जानती मगर जब तक जिन्दा है एक दूसरे के सच्चे हमसफ़र थे और रहेंगे..... 

सोमवार, 10 मई 2021

डेस्टिनेशन "अंतिम लक्ष्य "

 


"डेस्टिनेशन अर्थात  गंतव्य ,आखिरी पड़ाव या अंतिम लक्ष्य" 

     जब भी कोई सफर शुरू हुआ है तो वो कही ना कही जाकर खत्म जरूर होता है। अब  सफर सुखद हो या दुखद उसका अंत होना निश्चित है। आपको अपनी मंजिल मिली या नहीं आप सही गंतव्य पर पहुंचे या नहीं, ये निर्भर करता है आप की सफर के शुरुआत पर। आप जब ट्रेन सही पकड़ेंगे तो वो निश्चित रूप से आपको आपके सही गंतव्य पर छोड़ेगी ही।ज़िंदगी भी तो एक सफर ही है.... 

एक गीत के बोल है -

"ज़िंदगी का सफर है ये कैसा सफर

कोई समझा नहीं,कोई जाना नहीं ,

है ये ऐसी डगर,चलते हैं सब मगर 

कोई समझा नहीं,कोई जाना नहीं "

क्या सचमुच हम नहीं जानते,नहीं समझते या समझना ही नहीं चाहते ?

ज़िंदगी का सफर हो या ट्रेन का, एक ही नियम में चलती है। सोच-समझकर...अपने "अंतिम लक्ष्य" का  सही निर्णय कर....रास्ते की पूर्ण जानकारी लेकर....साथ में चल रहे सहयात्रियों के साथ ताल-मेल बिठाकर....सफर में आने वाले विघ्न-बाधाओं के लिए भी खुद को पहले से तैयार कर....जब सफर की शुरुआत करते हैं तो सुखद मंज़िल मिलनी        तय है। कभी-कभी सफर में अनहोनियाँ भी हो जाती है जिसका अंदाज़ा भी आप नहीं लगा सकते हैं                   उस परिस्थिति में भी खुद को सयंमित रखना भी नितांत आवश्यक होता है। 

ट्रेन के सफर के आखिरी पड़ाव को हम जानते हैं,उसके मुताबिक सहजता से पूर्व तैयारी कर रखी होती है हमने, अधिकांश लोग होनी-अनहोनी के लिए भी खुद को तैयार रखते हैं मगर ज़िंदगी का सफ़र.....जिसका आखिरी पड़ाव  "मौत" है उसके विषय में जानते सब है,समझते भी सब है परन्तु कभी भी पूर्व तैयारी करके नहीं रखते। 

क्यों ? क्योंकि "समय अवधि" का पता नहीं होता। हमें लगता है अरे ! अभी स्टेशन आने में काफी देर है और मरने की क्या तैयारी करना ? जब मौत आएगी तो चल पड़ेंगे उसके संग....कौन सा उसके लिए बोरियां-बिस्तर बांधना है ?

मगर दोस्तों,असली सफर तो यही है,इसकी तो तैयारी ज्यादा करनी होती है। क्योंकि ये सफर तो जन्म लेने के साथ ही शुरू हो जाता है और जैसे-जैसे सफर आगे बढ़ता है हमारी  मंज़िल तो पहले से तय होती है मगर....सफर सुखद होगा या दुखद ये हमारे खुद के जीवन शैली पर,सहयात्रियों के साथ हमारे व्यवहार पर,सफर के दौरान आई बिघ्न-बाधा के वक़्त  लिये गए सही-गलत निर्णय पर निर्भर करता है। ट्रेन-बस या किसी भी बाहन की यात्रा के दौरान यदि दुर्घटना होती है तो हम कहते हैं कि -यात्रा की  लगाम तो किसी और के हाथों में होता है उस पर हमारा नियंत्रण नहीं होता न ,मगर जीवन-यात्रा की पूरी लगाम तो हमारे हाथों में होती है। आज का हमारा कर्मा या कार्य कह लें वही हमारा कल निश्चित रूप से तय करता है। फिर भी सबसे ज्यादा कोताही या लापरवाही या गैर-जिम्मेदाराना हरकत हम इसी यात्रा में करते हैं। 

यात्रा कोई भी हो हमारा काम खुद संभल कर चलना नहीं होता हमारा काम होता है अपने सर आयी परेशानी का ठीकरा किसी और के सर फोड़ना। वाहन में दुर्घटना हुई तो ड्राईवर खराब था जीवन में दुर्घटना हुई तो सरकार गलत है या उससे भी बेहतर विकल्प भगवान का किया धरा है "हम क्या कर सकते हैं हम तो इनकी हाथो की कठपुतली है।" क्या  हम सचमुच  किसी के हाथों की कठपुतली है ? हम किसी के हाथों की कठपुतली नहीं है....       ना ही हो सकते हैं....हमें कोई नहीं नचा सकता.... हमारा नाचना हम स्वयं तय करते हैं। 

किसी शायर ने कहा है -

"मौत आनी है आएगी एक दिन,जान जानी है जायेगी एक दिन 

ऐसी बातों से क्या घबड़ाना,यहाँ कल क्या हो किसने जाना "

अच्छी लगती है ये पंक्तियाँ और 21 वी सदी के लोगो ने इसे अपना भी लिया। कल क्या होना है इस पर अपना जोर तो है नहीं तो आज जी लो जी भर के,मौज-मस्ती करो कल की फ़िक्र छोड़ो। 

जी लो यार, किसने रोका है मौत आएगी तो चल देना साथ मगर कम से कम ये तो तय कर लो कि - कुत्तों की मौत मरोगे या इंसानों की ?

अब यहाँ फिर ये सवाल -क्या फर्क पड़ता है मौत तो मौत है इसमें क्या च्वॉइस करना,कोई कपड़ा या खाना तो नहीं जिसके पसंद से मज़े में फर्क पड़ जाएगा ?

फ़र्क पड़ता है दोस्त ,यदि नहीं पड़ता तो आज हम अपने अपनों को चंद साँसों के लिए तड़प-तड़पकर मरते देख खुद भी ना तड़प रहे होते,उनकी अर्थियों को कन्धा ना दे पाने का मलाल नहीं होता, उनके शरीर को गैरो के हाथों या मशीन में जलते देखना इतना दुस्कर ना होता। एक बार फिर से ये सोच, क्या फर्क पड़ता है- मौत आयी मरने वाला मर गया.....अब मरने के बाद लाश को हॉस्पिटल वाले जलाये या म्युनिसिपल्टी वाले या कोई फर्क नहीं....है न ?

क्या सचमुच फ़र्क नहीं पड़ता है ?

हिन्दू मान्यता में "आत्मा" जैसी किसी चीज का जिक्र होता है। कहते हैं शरीर मरता है आत्मा अमर होती है।वैसे बहुत से हिन्दू विरोधी तत्व इसे अपने तर्क-वितर्क से सिरे से ख़ारिज करते हैं और कहते हैं  कि-ये ढकोसला है (कुछ लोग तो हिन्दू धर्म और संस्कार को राजनिक रूप भी दे देते है ) मगर हमने देखा है वही लोग सबसे ज्यादा ढकोसला बाजी करते हैं। खैर,वैसे मॉडन साइंस ने भी अब ये कहते हुए इसके आस्तित्व को स्वीकार लिया है कि -कुछ ज्योतिपुंज जैसी चीज तो होती है जिसके निकलते ही शरीर मर जाता है।आत्माओं के भटकने या बिना शरीर के उसके होने की बात भी अब वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध हो चुकी है।  

क्या सचमुच आत्मा होती है  ?

   होती तो है,ये शब्द बे-माने तो नहीं। गाहे-बगाहे हमने ये कहते सुना ही होगा और बोलते भी होंगे "मेरी अंतरात्मा पर बोझ है,मेरी अंतरात्मा तड़प रही है"क्यों कहते हैं हम ऐसा ? यकीनन आत्मा का मतलब "मन" है और सफर शरीर नहीं करता आत्मा करती है। तभी तो मन के थकने से शरीर थकता है मन के हारने से शरीर हारता है। शरीर तो बस आत्मरूपी मन का पोषक है और आत्मा का सफर अनंतकाल से चल रहा है और अनंतकाल तक चलेगा। अंतिम पड़ाव कहा होगा पता नहीं। लेकिन एक सफर से दूसरे सफर तक हम जिस पोषक में यात्रा करते हैं और  जिस गंतत्व तक हमें पहुंचना होता है  फ़िलहाल वही हमारा "आखिरी लक्ष्य" होता है।मगर इस  "आखिरी लक्ष्य" के बारे में हमने कभी सोचा  ही नहीं जो सबसे जरूरी था। 

ये जीवन सफर इतना मुश्किल पहले कभी नहीं था जितना आज हमने बना दिया है,सचमुच नहीं पता अगले पल क्या होने वाला है। क्योंकि यात्रा के दौरान हम राहों में जो गंदगी फैलाते आये है,सहयात्रियों से मुख मोड़ते आये हैं ,नियम-कानून तोड़ते आये हैं  ,सीधे शब्दों में जो अपने संस्कार छोड़ते आये हैं  उसका खामियाज़ा तो भुगतना ही पड़ेगा और भुगत ही रहें है तभी तो  श्मसान घाट तक भी अकेले जा रहे हैं  और आज की मौत तो हमें खुद की लाश को भी खुद के कंधे पर ढोने पर भी मजबूर कर रखा है। फिर वही बात -

"जब जागो तभी सवेरा"

 अब भी हम यदि सोते-सोते ही सफर काटेंगे तो "डेस्टिनेशन" पर तो पहुंच ही जायेगे क्योंकि वहाँ पहुंचना तय है मगर आत्मा पर इतना दर्द और बोझ लेकर जायेगे कि -हमारा अगला सफर इससे भी डरावना होगा। 

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

अँधा प्यार,अंधी भक्ति

   


  हमारी आदत होती है कला से कम और कलाकारों से ज्यादा जुड़नें की,खेल को कम खिलाड़ियों को ज्यादा महत्व देने की,भगवान की भक्ति कम मगर ढोंगी बाबाओं की भक्ति ज्यादा करने की। पता नहीं ये कैसी इंसानी प्रकृति है कि-हम किसी के इतने मुरीद हो जाते हैं  कि आँखे मूँदकर उन्हें सर पर बिठा लेते हैं। कभी-कभी तो जान लेने और देने तक को उतारू हो जाते हैं और हम जिन्हें  सर-आँखों पर बिठाकर अंधी भक्ति कर रहें होते हैं उन्हें ना तो हमारी कदर होती है ना परवाह,वो तो हम से पूरी तरह बेखबर रहते हैं। 

   चाहे वो कला की दुनिया के चमकते सितारे हो या धरती पर भगवान बन बैठे बाबा लोग,इन सभी के कारण आज  जिस तरह से सारे कद्रदानों के दिल टूट रहें हैं,ये दृश्य एक बार सोचने पर मजबूर कर देता है कि -"क्या हम सचमुच विवेकशील है।" हम क्यूँ नहीं समझतें कि ये सब भी हमारे जैसे ही हाड-मांस के पुतले इंसान ही है भगवान नहीं। उन के भीतर भी आम इंसानों की तरह ही छल-प्रपंच,ईर्ष्या-द्वेष,लालच-क्रोध,आशा-निराशा जैसे ही भाव है। वो हम से अलग नहीं है और ना ही वो हीरो और भगवान कहलाने के लायक है। 

   आज देश का जो माहौल बना है ये देखकर मुझे अपनी वर्षो पुरानी एक यात्रा-वृतांत याद आ गई। बात उन दिनों की है जब मैं 12 वी कक्षा में थी। मैं अपने पापा,दादा जी और दो बुआ (पापा की बहनें)के साथ ट्रेन में सफर कर रही थी। उन दिनों ट्रेन के सफर में एक वाद-विवाद का माहौल बन ही जाता था। कभी तो वो विवाद शांतिपूर्ण और एक स्वच्छ चर्चा-परिचर्चा भर होकर रह जाती और कभी तो युद्ध सा माहौल बन जाता "हम किसी से कम नहीं" वाली सोच लगभग हर किसी की होती थी (और है भी)। उस सफर के दौरान भी एक बहस छिड़ गई,विषय था "फ़िल्मी सितारे" मुख्य किरदार थे गुजरे जमाने के सुपरस्टार दिलीप कुमार जी और उस वक़्त के सुपर स्टार अमिताभ वच्चन जी। बात शुरू तो हुई उनकी उन्दा अदाकारी के चर्चे से,जिसमे मेरे पापा भी शामिल थे  (हमारा खानदान भी पूरा फिल्मची था) हम लड़कियाँ तो उस बहस में शामिल नहीं थी क्योँकि उस ज़माने में लडकियाँ चाहे कितनी भी पढ़ी-लिखी और मॉर्डन हो फिर भी हर जगह उन्हें बोलने की इजाजत नहीं थी (नहीं तो शायद मैं भी उस बहस में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही होती,वैसे भी फिल्मों के बारे में मेरा जेनरल-नॉलेज बड़ा तगड़ा था हाँ,राजनितिक बहस होती तो शायद चुप भी रह जाती)

   हाँ,तो शुरूआती बहस तो मजेदार थी कोई दिलीप जी बनाम "ट्रेजडी किंग" के इमोशनल सीन्स की खूबियाँ गिना रहा था तो कोई अमिताभ जी के "एंग्री यंगमैन" के सीन पर ताली दे रहा था मगर, धीर-धीरे दिलीप जी और अमिताभ जी की सच्ची और अंधी भक्ति  करने वाले पुजारियों की भावनाओं में उबाल आने लगा और चर्चा तर्क-वितर्क में बदलते देर ना लगी।तर्क-वितर्क पर भी बात थम जाती तो गनीमत थी मगर, देखते-ही-देखते बात लड़ाई-झगडे तक ही नहीं पहुँची बल्कि हाथापाई भी शुरू हो गई। जब तक बात स्वस्थ चर्चा तक सिमित थी तब तक मेरे दादा जी और पापा भी इस चर्चा में शामिल रहे मगर जैसे ही वो बहस का रूप लेने लगी उन्होंने उस बहस को रोकना चाहा मगर वो दीवाने किसी के रोके कहाँ रुकने वाले थे। फिर पापा और उनकी तरह के और बुजुर्ग उस चर्चा से अलग हो गए। मगर जब बात हाथापाई तक पहुँची तो सबने मिलकर बा-मुस्क्त उन्हें रोका। लेकिन जैसे ही ट्रेन एक जंक्शन पर रुकी वो सारे बहसबाज उस स्टेशन पर उतर गए फिर क्या था, ऐसा फाइटिंग सीन देखने को मिला कि पूछे मत,फिल्मों में भी ऐसा सीन कभी नही फिल्माया गया होगा,किसी का सर फटा,किसी की टांग टूटी। खैर, फिल्मो की तरह पुलिसवालों  ने आने में देर नहीं की,वो समय पर आ गए और ये कहते हुए उन दीवानों को ले गए कि -"अब बुला लो अपने-अपने सुपर स्टारों को जमानत के लिए"

    वैसी लड़ाई फिल्मों से बाहर देखकर उस वक़्त तो हम लड़कियों की जान सूख गई थी मगर घर पहुँचकर वो सारी  बातें याद कर-करके  हम खूब हँस रहें थे। उस दिन दादा जी ने हम सब को समझते हुए कहा था - "कला से जुड़ों कलाकारों से नहीं,शिक्षा से जुड़ों शिक्षकों से नहीं,ज्ञान से जुड़ों ज्ञान बाँटने वाले ज्ञानियों से नहीं, आस्था और भक्ति से जुड़ों  इस पथ को प्रदर्शित करने वाले पथप्रदर्शकों से नहीं। इंसान को विवेकशील रहना चाहिए,किसी को पसंद करना या प्यार करना,किसी के ज्ञान और भक्ति का सम्मान कर उसकी राह को अपनाना तो अच्छी बात है गलत तो तब होता है जब हम अँधा प्यार या अंधी भक्ति करने लगते हैं।कला को छोड़ कलाकारों से जुड़ जाते हैं,गुरु के दिखाए ज्ञान और भक्ति की मार्ग पर चलकर अपना जीवन सफल बनाने के वजाय गुरु के घर में जाकर बैठ जाते हैं और बिना सोचे-विचारे उन्हें भगवान से भी बड़ा बना देते हैं, हम क्यूँ  नहीं समझते कि ये भी इंसान ही है इनमे भी खामियां हो सकती है, किसी के गुणों का सम्मान कर उससे सीखो,समझों,अपनाओ और उन गुणों की पूजा करो किसी व्यक्ति विशेष को मत पूजों।

    लेकिन हमने तो बिना सोचे समझे पति तक को परमेश्वर बना डाला। सोच-समझकर किसी को भगवान बनाना चाहिए  क्योँकि भगवान से कभी गलतियाँ नहीं होती और इंसान गलतियों का पिटारा है इसलिए इंसान को इंसान ही रहने देना चाहिए। "

   दादी जी की कही एक-एक बात को हमनें गाँठ में बाँध लिया और ना ही कभी किसी से अँधा प्यार किया और ना ही किसी को अंधी भक्ति और सम्मान दिया । 

गुरुवार, 24 सितंबर 2020

"हमारी वैष्णो देवी यात्रा"

मेरा ये सफर थोड़ा लम्बा होने वाला है मगर.....यकीन मानिए, आप बोर नहीं होगें....बिघ्न-बाधाओं में उलझा ऐसा सफर शायद ही किसी ने किया हो.... 

      शायद ही ऐसा कोई हो जिसने वैष्णों देवी की यात्रा ना की हो,  वैष्णों देवी के दर्शन पर जाना बड़े सौभाग्य की बात मानी जाती है। पहले तो ये बड़ी ही कठिन यात्रा होती थी पर पिछले दो दसक से ये यात्रा सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण हो गई है और अब इस यात्रा पर लोग भक्ति और आस्था से नहीं बल्कि पर्यटक बन के जाने लगे हैं। पूरी यात्रा एक पिकनिक बन गई है....हाँ,साथ-साथ माता के दर्शन भी हो जाते हैं....कुछ अच्छी तस्वीरें मिल जाती है....सोशल मिडिया पर पोस्ट करने को....बहुतों को तो ऐसा जूनून है  कि वो हर साल माता के नाम पर ये मस्ती करने निकल जाते हैं... दस प्रतिशत लोग ही मन में सिर्फ माता के दर्शन का भाव लेकर जाते हैं।

          वैष्णों देवी या किसी भी तीर्थ यात्रा के प्रति लोगो की मानसिकता को देखकर मेरे अंदर कभी भी वहाँ जाने की लालसा ही नहीं जगी। मेरा मानना है कि भगवान हर जगह है, कण -कण में है और उससे भी थोड़ा गहराई में जाये तो, वो तो आपके अंतःकरण में ही है। हाँ ,यदि किसी तीर्थ-धाम पर जाकर भगवान के होने को महसूस करना चाहते हैं या यूँ कहें कि- परमात्मा की बनाई सुंदर  प्रकृति में उनके रूप को निरखना चाहते हैं तो सच्चे दिल से पुरी आस्था के साथ और एक व्रत की तरह इस यात्रा पर जाए और परमात्मा के अनंत मनोहरी रूप का आनंद उठाएं। और सबसे जरुरी बात स्वार्थपन, अल्हड़पन और मस्तीखोरी में इस सुंदर स्थल पर गंदगी फैलाकर प्रदूषित करने की वेवकूफी तो बिलकुल ही ना करें। हमारी इन्हीं  बेवकूफियों के वजह से ही  हम से रुष्ट होकर प्रकृति हमें  केदारनाथ जैसे प्रलय का रूप दिखा गई ,हम फिर भी सचेत ना हुए। खैर,इन सभी बातों से यकीनन किसी को दरकार नहीं।

      हाँ,तो मैं ये बता रही थी कि -माता के प्रति पूरी आस्था होते हुए भी मेरे अंदर कभी भी वहाँ जाने की इच्छा ही नहीं हुई थी।  परन्तु माँ ने मुझे अपने दर्शन का सौभाग्य दिया। यकीनन वो माता का बुलावा ही था क्योकि जाने के दो दिन पहले तक मैं सपने में भी नहीं सोची थी कि- मैं माँ के दरबार जाऊँगी।

     2008 की बात है -उनदिनों हम पति -पत्नी जीवन के बड़े ही कठिन दौर से गुजर रहें थे। पारिवारिक,आर्थिक ,मानसिक और शारीरिक  हर तरह से हम पीड़ित थे। उन दिनों कही भी जाने की बात हम सोच तक नहीं सकते थे। ऐसे समय में एक दिन मेरे पति के एक दोस्त का फोन आया (जो आर्मी में थे और जम्मू में उनकी पोस्टिंग थी )

    उन्होंने कहा -" मनोज ,हमारा ट्रांस्फर हो गया हैं और हम दस दिन के अंदर जम्मू छोड़ देगें ,हमारी दिली खवाहिश हैं कि हम सारे दोस्त सपरिवार एक बार माता के दर्शन करने चलें, मैंने तुम सब का टिकट करवा दिया है और मैं ना नहीं सुनुँगा ,तुम्हे आना ही होगा।"
    हम बड़े असमंजस में पड़ गए क्योकि एक तो आर्थिक स्थिति बुरी और दूसरे तीन महीने की लम्बी बीमारी भुगत कर मुझे विस्तर छोड़ें मात्र 15 दिन ही हुए थे। पतिदेव परेशानी में खुद से ही बड़बड़ा रहे थे-" नहीं जा पाएंगे.... तुम्हारी बीमारी का ही बहाना बना देगें...सभी पहले से जानते हैं कि तुम बीमार थी...हाँ,यही ठीक होगा।" लेकिन उनकी बातें मुझे सुनाई नहीं दे रही थी। अचानक से पता नहीं कैसे, मेरा मन माता के दर्शन को मचल उठा,मुझे महसूस होने लगा कि -जब हम माता के दर्शन कर लौटेगें तो हमारे सारे दुःख दूर हो जाएंगे। लेकिन आर्थिक स्थिति के कारण मैं कुछ बोल नहीं पाई। शाम को जब पापा मेरे घर आये तो मैंने अपने दिल की बात उन्हें बताई। सुनकर पापा खुश होते हुए बोले -" बेटा ,तुम खर्च की चिंता नहीं करों...मैं पैसा दूँगा....फिर थोड़ा सोचते हुए बोले-अगर तुम्हारी माँ और मैं भी साथ चलूँ तो कैसा रहेंगा.....आज तक हम भी तो माता के दर्शन नहीं कर पाए है....तुम सब इतने लोग रहोगे हम भी उसी में एडजेस्ट कर लेगें।
    माँ-पापा के साथ चलने की बात से तो मैं और ज्यादा ही खुश हो गई। मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि -अचानक ये सब क्या हो रहा है,सुबह 9 बजे तक तो इन बातों का दूर-दूर तक जिक्र भी नहीं था। मैं खड़ी सोच ही रही थी कि पापा पैसे देते हुए बोले -"सोच क्या रही हो भागों तैयारी करों...एक दिन ही है...नया  कपडा  भी तो लेना होगा।" तब तक पतिदेव भी आ गए,सारी बातें सुन बोले- "जय माता दी बोलो और चलो तैयारी करों" (अब से पहले मैंने कभी भी किसी भी परेशानी में पापा से आर्धिक मदद नहीं ली थी)7 जून की शाम को ट्रेन थी और 5 जून की शाम को ये सारी बातें हो रही थी।6 जून को दिन में आनन-फानन में हमने सारी तैयारी कर ली।आगे क्या होने वाला है इन बातों से अनजान...
     रात को अचानक माँ को तेज़ बुखार चढ़ गया और 7 जून की सुबह वो पूरी तरह पस्त हो चुकी थी। पापा आकर बोले-शायद अभी हमारा बुलावा नहीं आया है आप सब ये पैसे लो और ख़ुशी-ख़ुशी माता के दर्शन पर जाओं। मन उदास हो गया फिर भी माता की मर्जी मान हम निकल पड़ें।
   पतिदेव के दो दोस्तों का परिवार बेतिया (बिहार) से आने वाला था जो हमें  दिल्ली स्टेशन पर ही मिलते और वहाँ से हम सभी का टिकट पूजा एक्सप्रेस में बुक था।  जब हम स्टेशन पहुंचे तो हमें दूसरा झटका मिला वहाँ पर सिर्फ और सिर्फ इनके एक दोस्त आलोक जी अकेले मिले बाकी कोई नहीं। पता चला सबके साथ अचानक कोई ना कोई समस्या आ गया था और कोई भी नहीं आ पाया है। कहाँ बारह लोगो का ग्रुप आने वाला था और इकठ्ठे हुए मात्र चार,हम पति-पत्नी, 10 साल की मेरी बेटी और आलोक जी। मन और उदास हो गया ये सोचकर कि-"ये हो क्या रहा है और आगे और क्या होगा"
    ख़ैर,हम 8 जून की सुबह जम्मू पहुँचे,वहाँ अभिनव जी(मेरे पति के आर्मी वाले दोस्त) हमें लेने के लिए पहुँचे थे। उनके घर पहुंचकर उनके परिवार वालों से मिलकर अच्छा लगा,लगा आगे अब सब ठीक होगा।दिन भर वहाँ रूककर रात 9 बजे तक  हमें कटरा के लिए निकलना था और वहाँ से चार बजे सुबह से चढ़ाई आरम्भ करनी थी। दोपहर का खाना वगैरह खाकर हम एक दूसरे से गप्पे मारते हुए आराम किये।शाम को मैं और भाभी जी (अभिनव जी की पत्नी) कुछ खाना बनाने लगे, सफर पर ले जाने के लिए। बाकी नहा धोकर तैयार हो रहे थे। सभी नहा चुके थे बस अभिनव जी बचे थे उनके नहाने का पानी गर्म हो रहा था। अभिनव जी हल्ला मचा रहे थे कि जल्दी करो। भाभी जी जल्दीबाजी में जैसे ही गर्म पानी लेकर बाथरूम की ओर जाने लगी पुरे पतीला का पानी उनके पैरों पर गिर गया। अब तो अफरा-तफरी मच गई,भाभी जी का पूरा पैर बुरी तरह जल गया था। भाभी जी ने कहा -मैं तो अब जा नहीं पाऊँगी...आप बेटा  को लेकर इन लोगो के साथ चले जाये...बेटी मेरे पास रहेगी मेरी देख-भाल के लिए। अभी बातें हो ही रही थी कि  तभी, अभिनव जी के ऑफ़िस से फोन आया और उन्हें पता चला कि जो क्वॉटर उन्हें 15 जून को खाली करना था अब उन्हें 12 को ही खाली करना होगा। अब तो सारा मंज़र ही बिगड़ गया। हमने कहा -कोई नहीं जायेगा अब ...सब यही साथ रहेंगे...11 जून को हमारी वापसी का टिकट है अब इतने दिन आप सब के साथ ही गुजारेंगे। परन्तु भाभी जी को बुरा लग रहा था उन्हेने हमें मजबूर किया कि -आप सब आये है तो माता के दर्शन करने जरूर जाए और हमें यात्रा पर निकलना ही पड़ा । मन फिर थोड़ा उदास हो गया मगर मन में माता की दर्शन की ख़ुशी लिए हम निकल पड़ें, बस वही चार लोग और चारो अनजान उन राहों से जहाँ जाना था हमें.....
    रात के करीब 12-1 बजे हम कटरा पहुँचे,वहाँ एक और मुसीबत हमारी राह देख रहा था,वहाँ एक भी होटल या धर्मशाला में हमें जगह ही ना मिल रहा था और ऊपर से मूसलाधार बारिस। बड़ी मुश्किल से सर छुपाने की एक जगह मिली जहाँ हम माँ-बेटी को सामान के साथ बैठाकर ये दोनों दोस्त पर्ची कटवाने चले गए (यात्रा पर निकलने के लिए जो पर्ची बनती है)
    वहाँ पता चला कि -अत्यधिक भीड़ और बारिस की वजह से पर्ची कटनी बंद हो गई है अब 10 जून की सुबह ही पर्ची मिलेगी। अब तो सर छुपाने की जगह ढूँढना जरुरी हो गया था, बा-मसक्त हमें एक धर्मशाला में जगह मिल ही गया,अब लगभग 24 घंटे हमें गुजारने थे,बारिस इतनी जबरदस्त की कटरा में भी कही घूमने नहीं जा पाए। खैर, 10 जून को 5 घंटे की लम्बी लाईन में लगने के बाद 11 बजे दिन में आखिरकार हमें पर्ची मिली और 12 बजे तक हम माता के दरबार के लिए चढ़ाई करना प्रारम्भ किये।वहाँ फुटपाथ पर प्लास्टिक की हल्की-हल्की बरसाती (raincoat)मिल रही  थी हम वही पहनकर बारिस के मज़े लेते हुए मन में माँ के दर्शन की ख़ुशी लिए हुए,इस विश्वास के साथ की आगे सफर आनंदायक ही होगा, चल पड़ें।पर वो सफर ही क्या जिसमे रोमांच ना हो और बस चेकपोस्ट पर पहुंचते ही....
     चेकपोस्ट पार करते ही जो ब्रिज आता है वहाँ अचानक से भगदड़ मच गया, हमनें देखा बेलगाम घुड़सवारों का एक जत्था (जिसमे शायद कुछ घोड़े बिदक गए थे)लोगो को रौंदते हुए तेज़ी से बढे आ रहें थे और लोगों में अफरा-तफरी मच गई...सारे अपनी जान बचाने के लिए धक्का-मुक्की करने लगे ...हम कुछ समझ पाते इससे पहले दो घुड़सवार हम माँ-बेटी के बिलकुल सामने....वो तो इनके दोस्त ने तेज़ी दिखाई और हम माँ-बेटी को पकड़कर खींच लिया....पतिदेव हल्के चपेट में आने के कारण गिर पड़ें...मगर जल्दी ही खुद को संभलकर उठ खड़े हुए थे...हम चारों एक दूसरे को संभालते हुए एक किनारे पर सिमटकर खड़े हो गए।करीब 20-25 घोड़ो का जत्था था...उनके गुजरते ही ऐसा लगा जैसे कोई भयानक तूफान गुजर गया...और कई लोगो को घायल कर गया....हम शायद खुश किस्मत थे जो संकट हमें सिर्फ छूकर गुजर गया। मेरी बेटी डर से काँप रही थी...हम सब भी थोड़े घबराए हुए थे....इसलिए हम थोड़ी देर ठहर जाना ही उचित समझे। वही ढाँबे पर रुक हम कुछ खाने-पीने लगे और माता का शुक्रिया भी किया कि -उन्होंने हमें इस संकट से बचा लिया। मगर मेरे मन में एक हलचल सी मची हुई थी ये सोच-सोचकर कि-आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ?
    इन सब बातों में ही दो बज गया था। मैं शारीरिक रूप से कमजोर थी बेटी तो सहम ही गई थी इसलिए हमारी चलने की रफ्तार थोड़ी धीमी थी,हमें अर्धकुमारी पहुँचने में ही तीन घंटे लग गए। वहाँ पहुँचकर पता चला कि कल (यानि 11 जून)दोपहर 2 बजे  तक ही हमें दर्शन हो पाएंगा और उसी दिन  दिल्ली वापसी के लिए शाम 6 बजे का हमारा ट्रेन था तो हमने वहाँ का टिकट नहीं लिया लेकिन आलोक जी का 15 को वापसी का टिकट था इसलिए वो पर्ची ले लिए। अब हम माता के दरबार की ओर चल पड़े। रात 9 बजे तक हम मंदिर पर पहुंचे....नहाते-धोते 10 बज गया....जब दर्शन के लिए लाईन लगाने पहुँचे तो हमारे होश उड़ गए.....करीब 2 किलोमीटर से भी ज्यादा लम्बी लाईन। हमें अभिनव जी से आर्मी कोटे पर पास मिल सकता था मगर आने के समय जो बेचैनी फ़ैल गई  थी उस वजह से हम पास लेना भूल गए थे।वैसे अच्छा  ही हुआ था...जो भूल गए क्योँकि माता के दरबार में भी आम और खास होने का जो व्यपार चल रहा था....वो मुझसे देखा नहीं जा रहा था....बड़ा बुरा लग रहा था कि- सब ठंढ में ठिठुरते हुए कतार में लगे है और उस कतार को घंटों रोककर माता के दरबार में भी VIP लोगो की VIP पूजा चल रही थी। खैर,सुबह तीन बजे हम गुफा में प्रवेश कर पाए।(वो भी नए वाले गुफा से) हममें से कोई पहले यहाँ नहीं आया था सो हमें किसी भी बात की कोई जानकारी ही नहीं थी। सबसे आगे बेटी थी और फिर मैं फिर पतिदेव उनके पीछे आलोक जी थे। जैसे ही माता के आगे पहुँचे किसी ने अचानक बेटी का हाथ पकड़कर तेज़ी से खींच लिया...मैं उसका हाथ पकड़ी थी सो मैं भी खींच गई....देखा तो पुलिस था निकालो-निकलो करके चिल्ला रहा था....मुझे कुछ समझ ही नहीं आया तब तक पीछे से काफी लोग आ चुकें थे सो हमे मंदिर से बाहर निकलना पड़ा। और इस तरह जिनके दर्शन के लिए इतनी रुकावटें झेलकर मैं पहुँची थी उन्हें देख भी नहीं पाई कि-"वो है कैसी है?" शायद मेरे साथ ये सब इसलिए हुआ क्योकि मैं कभी भी किसी तीर्थस्थल पर गई ही नहीं थी तो वहाँ कैसा व्यवहार करते हैं या कैसी तेज़ी दिखाते है ये मैं जानती ही नहीं थी।मन रोने-रोने सा हो गया ख़ैर,मंदिर के बाहर ही प्रांगण में बैठकर मैंने मन ही मन माता का सुमिरन किया और अपनी अनजानी गलतियों की लिए क्षमा भी मांगी। 
   हल्की-फुल्की बारिस हो ही रही थी सो कही ठहरने की जगह भी बड़ी मुश्किल से मिली। जैसे-तैसे खाना खाकर हम आड़े-टेढ़े होकर थोड़ी देर आराम करने लगे। हमें किसी तरह 5 बजे तक भैरव मंदिर निकलना था (क्योँकि कहते हैं  कि अगर भैरवनाथ का दर्शन नहीं किया तो माता का दर्शन करना सार्थक ही नहीं होगा) और फिर हर-हाल में 3-4  बजे तक  जम्मू पहुँच जाना था क्योँकि 6.15 बजे हमारी ट्रेन थी। 
    मेरी बेटी थकान से चूर थी वो कुछ खा भी नहीं पा रही थी क्योंकि वहाँ जो कुछ भी मिल रहा था वो उससे बिलकुल खाया ही नहीं जा रहा था बस ब्रेड, बिस्कुट और जूस-वगैरह पी रही थी और अब तो वो भी उससे खाया नहीं जा रहा था । भूख से वो तड़पने लगती तो मुझे उसके पेट पर कपडा बांधना पड़ता। भैरवनाथ का दर्शन करके नीचे आते-आते हमें एक बज गया। बेटी बड़ी मुश्किल चल पा रही थी,अब आप कह सकते है कि -घोडा कर लेते लेकिन एक तो हमारे पास पैसे कम थे और दूसरे जो चढ़ाई आरम्भ करते ही घोड़ो ने हमें डराया था उससे हिम्मत ही नहीं हो रही थी। सफर पर धीरे-धीरे मुसीबतें और बढ़ती ही जा रही थी। समझ ही नहीं आ रहा था कि -"जीवन में पहले से क्या कम मुसीबतें थी जो मातारानी हमें यहाँ बुलाकर और सता रही थी। अलोक जी का साथ भी छूट चूका था वो अर्धकुमारी में ही रूक गए थे। 

    जब हम कटरा पहुँचे तो पता चल रहा है कि -वहाँ ट्रांसपोर्ट की हड़ताल है... कोई भी बस या गाडी जम्मू नहीं जाएगी...एक-दो प्राईवेट एजेंसियां जो बस चला भी रही थी उनके आगे तो माता के दरबार से भी ज्यादा लम्बी लाईने लगी थी। हम माँ बेटी को अलग-अलग लाईन में टिकट के लिए खड़ाकर पतिदेव कुछ और व्यवस्था मिले, ये देखने चले गए। बेटी का हाल देख मुझे रोना आ रहा था उससे खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था....अगर आज हम जम्मू नहीं पहुँचे तो ट्रेन छूट जाएगी....सबसे बड़ी परेशानी ये थी कि-हमारे पास गिने-चुने पैसे थे....फिर हमारा कब टिकट बनता...अभिनव जी भी 12 जून को ही घर छोड़कर बिहार चले जाने वाले थे....हम क्या करेंगे....ये सब कुछ झेलते-झेलते मेरी अंतरात्मा कुहुक उठी। दुःख के मारे तो हम पहले से भी थे,एक उम्मीद थी की ये सफर हमें थोड़ी ख़ुशी देगा जो अब तक नहीं मिली थी बल्कि मुसीबतें ही ज्यादा मिल रही थी और अब ये सबसे बड़ी मुसीबत थी। मैं तड़पकर रो पड़ी,मैंने माता से शिकायत कर दी -"हे मातारानी,मेरी सब्र का बांध टूट चूका है...आज अगर हमारी ट्रेन छूट गई और..हमें और मुसीबतों का सामना करना पड़ा तो...मैं आप से वादा करती हूँ...आज के बाद आपके दरबार में तो क्या, किसी भी देवी-देवता के दरबार में मैं नहीं जाऊँगी।"
    मेरी बात पूरी ही हुई थी कि पतिदेव बड़ी तेज़ी से दौड़ते हुए आये, सामान उठाया और मुझे बोले -"कुछ सवाल नहीं पूछों,बेटी का हाथ पकड़ों और जितना तेज़ दौड सकती हो दौड़ो।" पैरों में चलने की क्या, खड़े होने तक की जान नहीं थी और हम बे-तहाशा अपने शरीर को जबरदस्ती खीचतें हुए दौड़े जा रहे थे। करीब 5-600 मीटर की दौड़ लगाकर हम एक बस के पास पहुँचे जहाँ कंडक्टर अपने हाथ में चाय का ग्लास लिए बस के गेट पर खड़ा था,पतिदेव हाँफते हुए बोले -"हम आ गए सर" कंडक्टर पहले पतिदेव को देखा फिर अपनी चाय की गिलास की ओर देखते हुए मुस्कुरा दिया और इशारे से बस में चढ़ने  को कहा। बस में एक भी सीट खाली नहीं थी इन्होने कहा -"हमें खड़े होकर ही जाना पड़ेगा।"फिर उन्होंने मुझे सारा माज़रा बताया कि -किसी सवारी के तलाश में जब ये घूम रहें थे तो इन्हे ये बस दिखी जो सीधे दिल्ली को जा रही थी इन्होने कंडक्टर को सारी बातें बताकर  बड़ी मिन्नत की कि-हमें जम्मू तक छोड़ दे,दोगुना किराया देने को भी कहा मगर वो नहीं मान रहा था,इनके बहुत जिद्द करने पर इन्हे टालने के लिए उसने फ़िल्मी अंदाज़ में एक शर्त रख दिया,बोला -"मेरे हाथ के इस चाय के गिलास को देखों अगर मेरी चाय ख़त्म होने तक तुम आ जाओंगे तो तुम्हे बस में चढ़ा लूंगा मगर सीट फिर भी नहीं मिलेगी खड़े होकर ही जाना होगा" उसकी शर्त सुनते ही ये दौड पड़ें थे। कंडक्टर ने अपनी बात का मान रखा और हमें बस में चढ़ने दिया मगर सीट नहीं मिली। हमारे बस में चढ़ते ही बस खुल  गई थी। थकान और घुमावदार सड़क के कारण हम बस में खुद को खड़ा भी नहीं रख पा रहें थे,बेटी बार-बार गिर जा रही थी,हम दोनों ने उसे अपने बीच में दबा रखा था।कोई भी तरस खाकर मेरी बेटी तक को बैठने का जगह नहीं दे रहा था। उस दिन ऐसा महसूस हो रहा था कि-"सारी दुनिया बे-रहम हो चुकी है या भगवान के साथ-साथ सारे हमारे दुश्मन  चुकें हैं।"जब हम खुद को नहीं संभाल पाए तो, बस में नीचे ही बैठ गए लोग इस पर भी ऐतराज़ कर रहें थे और हम भिखारियों की तरह उनसे मिन्नतें  कर रहें थे। हाँ,बस के कंडक्टर ने हम पर रहम किया था और उसने हमसे पैसे भी नहीं लिए थे। हम 5.30 बजे तक जम्मू पहुँचे....बस ने जहाँ हमें उतरा था...वहाँ से रेलवे स्टेशन तीन किलोमीटर दूर था...वहाँ भी ट्रान्सपोर्ट का हड़ताल...ये सुन हमारे तो रहे सहे होश भी उड़ गए...अब क्या करें? बड़ी मुश्किल से एक ऑटों वाला राजी हुआ वो भी इस शर्त पर की स्टेशन से आधा किलोमीटर पहले ही वो हमें छोड़ देगा। अब ऐसी परिस्थिति में अभिनव जी के घर जाकर सामान लाने का भी वक़्त नहीं था। हमने अभिनव जी को फोनकर सारी  बात बताई उन्होंने कहा मैं समान लेकर स्टेशन आता हूँ,चुकि टिकट भी समान के साथ था इसलिए सामान माँगवाना भी जरुरी ही था। 
    ऑटो वाले ने जहाँ हमें छोड़ा था वहाँ से आधे किलोमीटर की वो "पैदल सफर" की यादें इतनी खौफनाक है कि -आज भी मेरी बेटी वो दिन याद कर सिहर उठती है। हमारे पैर बेजान हो चूके थे,एक-एक कदम उठाना मुश्किल था। स्टेशन पहुँचते-पहुँचते 6 बज गया था अभिनव जी आ चूके थे मगर चैकिंग करवाकर प्लेटफार्म तक 15 मिनट में पहुँचना असम्भव था क्योँकि यह भी लाईन बहुत लम्बी थी, यात्री आपस में धक्का-मुक्की और झगड़ें-लड़ाई पर उतर आये थे। बा-मसक्त अपने रुसुक का (आर्मी में होने का) प्रयोग कर अभिनव जी ने हमें प्लेटफॉम तक पहुँचाया। प्लेटफॉर्म पर पहुँचते ही ट्रेन खुल चूकी थी,जैसे-तैसे चलती ट्रेन में ही किसी भी कम्पार्टमेंट में हम चढ़े गए,हमारे चढ़ने के बाद एक-एक करके हमारे सामान को अभिनव जी ने फेका फिर ट्रेन के साथ दौड़ते हुए ही दो दर्जन केले लेकर दिए और हाँफते हुए ही भीगी आँखे लिए हाथ हिलाते हुए हमें अलविदा कहा। 
    ट्रेन में अपने सीट तक पहुँचकर जब हम बैठे तो उस वक़्त की  मनोदशा मैं  बता नहीं पाऊँगी। समझ ही नहीं आ रहा था...ये हुआ क्या....कैसा सफर था ये.....क्यूँ हुआ हमारे साथ ऐसा ?भूख और थकान से हम बेहाल थे दो-चार केले खाकर हम निद्रामाता के गोद में चलें गए क्योँकि अब हमें शुकुन वही मिल सकता था। दुनिया से बे-खबर  इतनी गहरी नींद हम सो गए कि -खाना का ऑडर लेने वाला कब आकर चला गया पता ही नहीं चला। 9 बजे जब भूख से बेटी के पेट में दर्द होने लगा तब उसने उठाया। पूछने पर पता चला कि -अब खाना ख़त्म हो चूका है। बेटी रो रही थी मैंने एक भेंडर के पास जाकर मिन्नत की कि -कुछ भी दे दो। तब उसने अपने खाने से निकलकर एक पैकेट फ्राइड राइस दिया उस वक़्त वो इंसान मुझे देवतुल्य अन्नदाता नजर आ रहा था। 
 12 जून की सुबह सफर खत्म हो चूका था लेकिन छोड़ गया था....ढेरों सवाल और अजीबोंगरीब अनुभव....समझा गया था भूख का मतलब... वक़्त की, इंसानियत की कीमत...सीखा गया था कि -जीवन में परिस्थितियाँ बद-से-बदतर हो सकती है....ऐसे वक़्त में संयम और हौसला बनाये रखना कितना जरुरी है....और सबसे बड़ी सीख....हर इंसान को जीवन का कोई भी सफर अकेले ही तय करना होता....किसी ने साथ चलने का वादा किया भी हो तो क्या.....उसके वादें पर भरोसा करने के वावजूद भी.....खुद को सिर्फ और सिर्फ खुद के और भगवान के भरोसे ही रखना। 
  हम माता के दरबार से लौट आये थे मन में ढेरों असमंजस और सवाल लिए... लेकिन कहते हैं न कि परमात्मा की कोई भी लीला बे-माने नहीं होता है.....धीरे-धीरे हमें समझ आने लगा था.....वहाँ से लौटे के बाद हमारे भीतर एक अजीब सी शांति और संतोष का अनुभव होने लगा.....एक-एक करके हमारे जीवन की हर एक समस्या का सामाधान मिलने लगा.....और सबसे बड़ी बात हमें जो लोगों से अपेक्षाएं होती थी और उपेक्षित होने पर जो दुःख होता था वो बिलकुल खत्म हो गया किसी से कोई अपेक्षाएं ही नहीं रही...और रोग-दुःख तो मेरे घर से कोसो दूर हो गया.....धीरे-धीरे हमारे घर में सुख,शांति और समृद्धि का वास होने लगा। शायद, नहीं यकीनन मातारानी  ने हमारे शेष जीवन के कष्टों को उन्ही 6 दिनों में देकर हमारे सारे कष्ट हर लिए थे और जीवन को सुखमय बनाने के कई मंत्र सीखा गई थी....हम पति-पत्नी जो अनगिनत परेशानियों के वजह से एक दूसरे से दूर होते जा रहें थे... करीब आ गए थे। 

                      ये सफर "मेरे जीवन परिवर्तन" का सफर था......   
                                        (और पहला और आखिरी तीर्थयात्रा भी )

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

एक यादगार मुसाफिर

   

    यात्रा करने के साधन तो बहुत से है पर मुझे सबसे आरामदायक और मनोरंजक  सफर ट्रेन का ही लगता था और हैं भी। पहले तो वैसे भी हवाई यात्रा सबके बस की बात नहीं थी और बस या कार से सफर करना मुझे बिलकुल अच्छा नही लगता। अगर लम्बी यात्रा हो तो ट्रेन के क्या कहने,  12 -15 घंटे के लम्बे सफर में ट्रेन  का वो कम्पार्टमेंट घर जैसा एहसास देने लगता है और सफर में जो अजनवी साथ होते हैं वो जन्मों के बिछुँड़ें साथी से लगने लगते हैं (ये मैं बीते ज़माने की बात कर रही हूँ)। ट्रेन की झुकझुक आवाज़ संगीत की एक अनोखे साज से निकली मधुर आवाज़ लगती है। बस्ती ,जंगल ,नदी और पहाड़ों  को पार करती ये झुकझुक गाड़ी कई  मनोरम दृश्यों का दर्शन करा देती है। रात के सन्नाटों को चीरती जब ये तेज़ गति से अपनी  पटरियों पर दौड़ रही होती है तो ऐसा लगता है जैसे कोई मलंग अपनी ही मस्तियों में डूबा हुआ अपनी मंजिल की ओर बे -खौफ बढ़ा जा रहा है।
   मेरी ज्यादातर यात्राएं पापा के साथ ही हुई है क्योँकि पापा की लाड़ली थी तो वो हर जगह मुझे ही अपने साथ लिए घूमते थे। घर में इस बात के लिए दादी के ताने भी सुनने को मिलता था, वो हमेशा पापा को ताना देती -" बेटी को इंदिरा गांधी बना रखा है जहाँ जाता है बेटी को साथ लिए फिरता है " मगर पापा को इससे फर्क नहीं पड़ता था, उन्हें तो मेरे बिना कोई सफर करना ही नहीं था।
     पापा के साथ ऐसे ही एक सफर में एक अजनवी से मुलाकात हो गई थी, एक ऐसा मुसाफिर जिसकी हल्की  झलक आज भी याद आ ही जाती है। बात उन दिनों की है जब मैं 10 वी में थी, 15 साल की उम्र थी मेरी मगर लड़का-लड़की के प्रति आकर्षण वाले एहसास से मेरा मन अब तक अछूता था। कोई लड़का मुझे देख रहा है इस बात का ना मुझे एहसास ही होता था ना ही मैं इसकी परवाह करती थी। अपनी ही मस्ती में मग्न, जो मिला उसी के साथ बातों में मसगुल हो जाना, ठहाकें लगाना बस यही आता था मुझे, मेरा बचपना मुझ पर अभी तक हावी था, अब इसके लिए कौन मुझे कैसे देख रहा हैं या क्या सोच रहा है, मेरे पीढ़ पीछे क्या बोल रहा है, इससे मैं बे-खबर रहती थी। मेरी इन्ही आदतों के कारण सफर में भी मैं बहुत जल्दी सबसे घुल-मिल जाती थी, वो हम-उम्र हो ,बच्चा हो या बूढ़ा फर्क नहीं पड़ता था, सब मेरे दोस्त बन जाते थे। 
    तो मेरे इस सफर के दौरान भी कुछ ऐसा ही हुआ, हमारे साथ कपार्टमेन्ट में एक परिवार था तीन बच्चें और पति पत्नी, मैं उन सब के साथ बड़ी जल्दी घुलमिल गई और मेरी मस्ती शुरू हो गई। उसी कम्पार्टमेंट में 17 -18 साल का एक लड़का भी बैठा था, आकर्षक व्यक्तित्व था उसका मगर बेहद शांत और गंभीर। हाँ,हम सब जब बातें करते तो वो बीच-बीच में थोड़ा बहुत बोल लेता था या हल्की मुस्कान बिखेर देता था।मुझे ऐसे लोग बिलकुल पसंद नहीं थे, मुझे तो हंसी ठहाकें लगाने वाले जिंदादिल लोग पसंद थे पर पता नहीं क्युँ, वो मुझे थोड़ा-थोड़ा अच्छा लग रहा था।
    खैर ,सफर के दौरान मैंने गौर किया कि-जब से मैं ट्रेन में बैठी थी ये महाशय चोरी छिपे मुझे ही देखें जा रहें थे। मुझे ऐसे लोग भी बिलकुल पसंद नहीं थे सो, मैंने उन्हें इग्नोंर किया और बच्चों के साथ लगी रही और उसकी निगाहें मुझ पर टिकी रही। जब मैं उसे घूरने लगती तो हल्की सी मुस्कान के साथ नजरें नीची कर लेता। ऐसा नहीं था कि -पहली बार कोई लड़का मुझे घूर रहा था मगर उसमे कुछ अलग बात तो थी और सब से आकर्षक थी उसकी शालीनता। पापा से तो वो खूब बातें करता पर मुझसे बिलकुल नहीं। रात हुई हम सबने साथ ही मिल-बाँटकर खाना खाया, वो खाना नहीं लाया था तो पापा मुझे उसे भी खाना देने को बोले, मैंने दो पराठे और सब्जी उसे भी दे दी, वो मुस्कुराते हुए थैंक्यू कह कर ले लिया। खा-पीकर सब अपने-अपने बर्थ पर सोने चले गए। वो ठीक मेरे सामने वाले बर्थ पर था और लगातार एक हलकी मुस्कान लिए मुझे देखें ही जा रहा था। उसकी निगाहों में कुछ तो था जो मुझे भी असहज कर दे रहा था। ऐसा मुझे पहली बार महसूस हो रहा था सो और भी अजीब लग रहा था। मैं बार-बार मुँह फेर कर सो जाने की कोशिश कर रही थी मगर मुँह फेरने के बाद भी मैं उसकी निगाहों से खुद को बचाने में असमर्थ हो रही थी। वो कोई गलत हरकत नहीं कर रहा था मगर उसकी मुस्कुराती नजरें बहुत कुछ बोलने में समर्थ थी।
    मैंने सोचा अब मैं इसे घूरना शुरू करती हूँ तो शायद वो अपना मुँह फेर ले, मैं भी उसकी तरफ एकटक  देखने लगी मगर मेरे साथ ऐसा पहली बार हुआ कि -मैं ज्यादा देर उससे नजरें नहीं मिला पाई, फिर अपनी आँखें बंद करना ही मुझे उचित लगा। मैं अपनी आँखें भींचे सोने की कोशिश करने लगी। मगर जब नींद खुलती तो देखती कि -उसकी आँखें तो अब भी मुझ पर ही टिकी है। खैर, इस आँख-मिचौली में मैं कब गहरी नींद सो गई मुझे पता ही नहीं चला।
    सुबह जब मेरी आँख खुली तो देखती हूँ कि-सामने का बर्थ खाली है, मुझे लगा शायद वो बाथरूम गया होगा। बाकी सभी लोग अभी सो ही रहे थे। तभी मेरी नजर मेरी उंगलियों के बीच फंसी एक पर्ची पर गई, दो सेकेण्ड के लिए मैं बुरी तरह सिहर गई ,बड़ी हिम्मत करके मैंने इधर-उधर देखकर वो पर्ची खोली, उसमे लिखा था -"रानी, तुममे मुझे अपनी  "सोलमेड" नजर आ गई है...एक रात में ही मैं तुम्हे बेहद प्यार करने लगा हूँ...अगर तुम्हारे दिल में भी मेरे लिए कोई फिलिंग आ गई है तो प्लीज़ इस नंबर पर मुझे फोन करना...मैं बेसब्री से तुम्हारे फोन का इंतज़ार करुँगा...मैं तुम्हें अपना नाम नहीं बताऊँगा...अगर कॉल करोगी तब तो मेरा नाम जान ही जाओगी.. अगर नहीं कर पाओगी तो एक अजनवी समझ भूल जाओगी।" ये दो लाईन पढ़ते-पढ़ते मुझे महसूस हुआ कि-मेरी पलकें गीली हो गई है,ऐसा कैसे हुआ, क्युँ हुआ, समझ ही नहीं पाई।
    मैंने उस पर्ची को छुपाकर अपने पर्स में रख लिया। वो कौन था, कहाँ से आ रहा था, कहाँ उतर गया, उसका नाम क्या था मैं कुछ नहीं जान पाई थी। मगर मेरे बक-बक करने के कारण वो मेरे बारे में सब कुछ जान चुका  था। सफर खत्म हुआ और हम लौटकर अपने घर आ गए,कई महीनों तक वो पर्ची मेरे पास रही, रोज उसे खोलकर पढ़ती और सोचती -" कॉल करूँ क्या?" पर हमारे संस्कारों ने मुझे ये करने की इजाजत नहीं दी, मैं अपने पापा के विश्वास को नहीं तोड़ सकती थी। उस दौर में छोटी उम्र में किसी लड़के के बारे में सोचना भी गुनाह था,छोटी उम्र क्या हम लड़कियों को खुद के पसंद का लड़का चुनना तो पाप ही समझा जाता था, हम लड़कियों को ऐसे ही संस्कार मिले थे। एक दिन हिम्मत करके वो पर्ची मैंने फाड़कर फेक ही दी, मेरे पापा के मान -मर्यादा से बड़ा मेरे लिए कोई नहीं था ना है। कई बार ऐसा लगता कि -कही वो मेरे घर तक तो नहीं आ जाएगा क्योँकि पापा से बातों-बातों में वो सब कुछ जान चुका था। मगर वो नहीं आया, यकीनन उसे मेरी "पहल" का इंतज़ार होगा। 
    आज भी ट्रेन के सफर के दौरान कोई लड़का किसी लड़की को टकटकी बाँधे देख रहा होता है तो उस मुसाफिर की याद आ ही जाती है। 




गुरुवार, 2 जुलाई 2020

कभी भी ना भूलनेवाला डर का सफर...

  

    यूँ तो जीवन का हर पल अनिश्चितताओं से भरा होता है ,कब क्या हो जाएं पता नहीं। वैसे ही जब हम कही यात्रा पर निकलते हैं तो हमें नहीं पता होता कि-आगे क्या होगा। फिर भी यात्रा पर निकलते वक़्त हम अमूमन घर से अच्छा ही सोचकर निकलते है कि -"हमारा सफर सुखद होगा सुरक्षित होगा "ये अलग बात है कि-कभी-कभार सफर में कुछ चाहा या अनचाहा घटना घटित हो जाता हैं।
    मगर इस बार मेरा ट्रेन का सफर जितना भयावह था,अब से पहले कभी नहीं रहा। मुंबई से दिल्ली जाने के सफर की तैयारी करते वक़्त पहली बार सफर के अनिश्चितता का आभास और डर पहले से ही हावी हो चूका था (लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद मुंबई से दिल्ली अपने परिवारवालों के पास जाना था) टिकट बनने के दिन से ही एक दहशत मन मस्तिष्क पर हावी हो गया था। डर किससे रहे है ये भी समझ नहीं आ रहा था। ट्रेन में चोरी डकैती या एक्सीडेंट जैसी घटनाओं से क्या डरना,इन अनहोनियों के साथ सफर करने की तो आदत बन चुकी हैं। जहां तक मौत से डरने की बात है तो उससे क्या डरना वो तो कही भी किसी भी वक़्त आ सकता हैं। फिर भी एक अनदेखा सा दुश्मन हर पल आस पास नजर आ रहा था।
    घर से निकलते वक़्त हम माँ बेटी ने खुद को पूरी बाजु के कपडे ,मास्क,दस्ताने,चश्मे आदि से हर तरफ से ऐसे ढक लिया था जैसे जंग पर जाते समय सिपाही खुद की सुरक्षा के लिए सुरक्षा कवच पहनते हैं। हम सचेत थे,ताकि वो मौत का वायरस कही से भी हमारे शरीर में प्रवेश ना कर सके। अपनी रक्षा के लिए हाथ में एक छोटा सा गन (स्नेटाइजर का बोतल) भी ले रखा था ताकि हम उस अनदेखे दुश्मन पर वार कर सकें। टेक्सी में बैठते वक़्त पूरी टेक्सी को सेनेटाइज कर खुद को ये यकीन दिलाने की कोशिश की कि -ये क्षेत्र दुश्मनों से रहित हो गया। अगला पड़ाव ट्रेन,वहां भी हमने बड़ी सावधानी से अनदेखे दुश्मन पर वार कर उसे मारने की कोशिश की। ये सब करते हुए समझ ही नहीं आ रहा था कि -हम मार किसे रहे हैं?आज से पहले ट्रेन के सफर के सहयात्री थोड़ी देर के लिए ही सही अपने परिवार से लगते थे मगर आज वही सहयात्री (खास तौर पर जो लापरवाह थे)चलते फिरते मौत के वाहक नजर आ रहे थे।
   जीवन में मैं कभी भी किसी भी चीज़ से नहीं डरी ,डरना मैंने सीखा ही नहीं,जीवन में अब से पहले कभी डर का एहसास ही नहीं हुआ था। मगर पहली बार मुझे डर लग रहा था ।जीवन के इस अनोखे,डरावने सफर के 20 घंटे का एक एक पल दहशत भरा था। क्योँकि अब से पहले किसी भी बिपदा या दुश्मन का सामना करते वक़्त एक इत्मीनान रहता था कि " अगर कुछ बुरा हुआ तो सिर्फ मेरा होगा" मगर इस बार ये डर कि -ये अनदेखा दुश्मन मुझे भी मौत का वाहक तो नहीं बना लेगा, अपनों के पास पहुंचने की बेताबी में " कहीं मैं उनके लिए बिपति की वजह तो नही  बन जाउंगी" खुद का अहित हो कोई बात नहीं मगर अपनों का अहित मेरी वजह से...ये सोचकर भी मैं काँप जा रही थी। 
    खैर,भगवान का स्मरण करते हुए हम दिल्ली पहुंचे तो अपनों को गले भी ना लगा सकें,उन्हें छू भी ना सकें,खुद को उनसे ऐसे दूर रखा जैसे हमें कोई "छूत" का रोग लगा हो। फिर पास-पास रहते हुए भी 14 दिन अछूतों की तरह अलग अलग रहकर अलगाव का दंश झेलना,वो 14 दिन का सफर जो रुका हुआ था उसका एक एक दिन जब गुजर जाता तो ये ढाढ़स होता कि-"शायद दुश्मन हमारे शरीर में प्रवेश नहीं कर पाया हैं और हम जीने के काबिल हैं और दूसरों को भी जीवन देने के काबिल हैं।" 
   कहने को तो उस सफर की समय अवधि 20 घंटे की थी मगर हमारा सफर 20 दिन का था,सफर शुरू करने के पहले का पांच दिन सफर पर निकलने की हिम्मत जुटाने का,एक दिन का ट्रेन का सफर और 14 दिन इस इंतजार का कि-"कही मौत के वायरस ने हमें छुआ तो नहीं।"
    जो बीस दिन के डर और दहशत के सफर से हम गुजरे,उसी पीड़ा से ना जाने कितने गुजरे होंगे और अभी भी गुजर रहे हैं।अपनों के पास होकर भी अपनों से नहीं मिल पाने की पीड़ा इस बात का एहसास करा रही थी कि -" यकीनन प्रकृति हमें अपनों की अवहेलना करने की गुनाह की सजा दे रही  हैं। 
    परन्तु मन सवाल कर रहा था -"ये गुनाह हमनें तो कभी नहीं किया ,फिर हमारे साथ ऐसा क्यों ?जबाब मिला -"अक्सर जौ के साथ घुन भी पीसते हैं" क्योँकि घुन जौ के साथ जो रहता हैं। हम भी कुछ लापरवाह और गैरजिम्मेदाराना लोगो के साथ रहते हैं और ख़ामोशी से उनके गलतियों को देखते रहते हैं तो हमें भी सजा मिलनी लाजमी हैं न।  मेरे पापा एक भजन गया करते थे -
"आदमी आदमी को सुहाता नहीं 
आदमी से अरे, डर रहा आदमी " 
आज ये सौ फीसदी सत्य हो चूका हैं....और हम सब इसके गवाह बन चुके हैं..
" जीवन में कभी भी ना भूलनेवाला डर का सफर,मगर साथ ही साथ ये विश्वास
 कि  हमनें कुछ गलत नहीं किया हैं तो हमारे साथ कुछ बुरा हो ही नहीं सकता.... "





गुरुवार, 14 मई 2020

जब लिट्टी खाना महंगा पड़ा

  

   बात उन दिनों की हैं जब मैं 9 वी क्लास में थी। मैं और पापा,  दुमका ( झारखंड ) से मुजफ्फरपुर (बिहार) की  ट्रेन में सफर कर रहे थे।उन दिनों रिजर्वेशन का खास मसला नहीं होता था। जेनरल कम्पार्टमेंट में भी सफर आरामदायक ही होता था। आज की जैसी आपा -धापी तो थी नहीं। ज्यादा से ज्यादा सफर जरूरतवश ही की जाती थी। ट्रेन में खोमचे वालों ( खाने -पीने का समान बेचने वाले ) का आना- जाना भी लगा रहता था। खाते-पीते सफर आराम से कट जाता था। बिहार की एक खास पकवान लिट्टी -चोखा उस लेन में ज्यादा से ज्यादा बिकने वाली लाज़बाब पकवानो में से एक होता था। 
    ट्रेन अपनी रफ्तार से चली जा रही थी ,रात के करीब आठ बजे थे, एक लिट्टी -चोखा बेचने वाला हमारी कम्पार्टमेंट में चढ़ा। अपनी लिट्टी- चोखे की तारीफ करता हुआ , वो बार बार पैसेंजरों को उन्हें खाने के लिए उकसाने की कोशिश कर रहा था। सबके पास जाकर बोलता -" भाई जी आप लेलो ,अंकल जी आप खा लो बस दस में चार दे रहा हूँ। " मगर कोई भी उसकी ओर ध्यान नहीं दे रहा था। सब घर से लाए अपने खाने को खाने में लगे रहें। जब नौ बजने को आया तो अचानक उसके सुर में बदलाव आ गया ,उसने कहा -"  अरे ,भाइयों एक घंटे में गोंडा स्टेशन आ जाएगा.. मैं वहाँ उतर जाऊँगा ..मेरा वही घर हैं न ...अब मेरी लिट्टी तो बिकी नहीं घर जाकर इसे फेकना ही होगा ....आप में से जो कोई भी भूखा हो और खाना चाहते हो वो आकर खा ले ...फेकने से अच्छा हैं किसी के पेट में चला जाए ....फ़िक्र ना करे मैं फ्री में खिलाऊँगा ....एक पैसा भी नहीं लूँगा। "
   फिर क्या था सब भूखे भेड़िये की तरह उसकी लिट्टी पर टूट पड़े हर एक ने जी भरकर खाया ,उसने पापा से भी कहा -" अरे ,अंकल जी आप नहीं खोओगे ,अरे खाओ- खाओ में पैसे नहीं लूंगा "पापा मेरे बड़े मधुरभाषी थे उन्हेने बड़े प्यार से कहा -"अरे ,बेटा जी आप आने में देर कर दिए थे....हम तो आपके आने से पहले ही खाना खा चुके थे वरना लिट्टी तो मेरा पसंदीदा हैं.... आप बीस के चार भी देते तो खा लेता ....लेकिन अब नहीं ,आपकी लिट्टी फ्री हैं मेरा पेट तो नहीं " फिर पापा धीरे से मुझसे बोले -" बेटा मुझे तो दाल में कुछ काला लग रहा हैं ,आप चुपचाप जाकर ऊपर वाले बर्थ पर सो जाओं। " मैं  सोने चली गई। मगर नींद कहाँ आ रही थी बस सोने का नाटक कर रही थी। 
    जब लिट्टी वाले की टोकरी खाली हो गई तब वो बड़े अड़ियल अंदाज़ में बोला -" क्युँ भईया सब का पेट भर गया न।" सब डकार मरते हुए खुश होकर बोले -" अरे भाई ,बहुत बहुत धन्यवाद तुमको ...आज तो मज़ा आ गया।" अब लिट्टी वाले ने फिर अपना  सुर बदला -"  भईया जी, आपके धन्यवाद का मैं आचार डालूंगा क्या .....धन्यवाद नहीं पैसे निकले ....दस का एक के हिसाब से....समझे।" अब बारी सभी के चौकने की थी ,सब एक सुर में बोले -" तुमने कहा था कि- फ्री हैं ?"  उसने गंदी गाली देते हुए कहा -" बाप का माल समझे थे....एक घंटे से मैं सबकी मिन्नत कर रहा था कि -कोई तो गरीब पर तरस खा ले और मेरी कुछ लिट्टी तो बिक जाए ....मगर किसी को भूख नहीं थी और फ्री का सुनते ही सबके पेट में कुआ बन गया सब ठूँसने लगे .....अब पैसे निकालों नहीं तो एक एक को खींचकर ट्रेन से नीचे फेक दूंगा..... अरे, सच तो सिर्फ अंकल जी लोग बोल रहे थे ...चलो अंकल जी,  आप सब ऊपर बर्थ पर जाकर सो जाओं.... अब मैं इनका पेट खाली करने वाला हूँ- वो पापा और उनके साथ ही बैठे दो तीन बुजुर्गो की तरफ देखते हुए बोला.... फिर मेरी तरफ देखते हुए बोला -अच्छा हैं बिटिया सो गई है ....चलो बिटिया,  तुम अपना मुँह उस तरफ कर लो।" मैं समझ गई अब तो कुछ भयंकर होने वाला हैं क्योकि गोंडा के किस्से बड़े प्रसिद्ध थे  ,मैंने झट मुँह फेर लिया। 
    वो  जब लिट्टी खिला रहा था तो बड़े ही चालाकी से ये कहते हुए कि -" अरे भईया आपने तो अभी दो ही लिए दो और लेना " उसने सबकी लिट्टी की गिनती  भी कर ली थी और सबसे कबुलवा भी लिया था, तो झूठ बोलने की गुंजाइश थी नहीं किसी के पास। जो लोग लालची तो थे मगर थोड़ा सरीफ थे,  वो तो डरकर पैसे निकालने लगे।मगर कुछ लोग जो खुद को उससे बड़ा गुंडा समझते थे भिड़ गए उससे। बाता -बाती ,गाली -गलौज,हाथापाई तक होने लगा।  ट्रेन के गोंडा स्टेशन पर रुकाते ही उस लिट्टी वाले ने जोर से मुँह से कुछ आवाज़ निकली ( शायद कोई कोडबर्ड था )उसकी आवाज़ सुनते ही एक मिनट भी नहीं लगा सेकड़ो भेंडर्स इकट्ठे  हो गए ,यात्रियों को खींच खींचकर ट्रेन से उतारने लगे। रलवे के स्टाफ ,टी.सी ,सब आ गए। टी. सी. ने सबको समझाया- इनसे टककर लेने का कोई फायदा नहीं... तुम सब जब तक पैसे नहीं दोगे ट्रेन आगे नहीं बढ़ेगी... पाँच मिनट में ही सारे गाँववाले भी इकट्ठे हो जाएंगे फिर तो मार -काट ही मच जाएगा। आख़िरकार यात्रियों को पैसे देने ही पड़े वो भी दस के एक के हिसाब से। पुरे कम्पार्टमेंट में बस सात लोग ( मुझे और पापा को लेकर ) थे जिन्होंने लिट्टी नहीं खाई थी ,हम ट्रेन में ही थे मगर किसी अनहोनी के डर से हमारा गला भी सुख रहा था। खैर ,आधे घंटे के लफड़े के बाद ट्रेन वहाँ से रवाना हुई और हमारी जान में जान आई। 
  फ्री के खाने का संस्कार तो हमारा था नहीं फिर भी उस दिन ये दो कसम जरूर खा ली मैंने कि -" भूख से मर जाऊँगी मगर फ्री का नहीं खाऊँगी और दूसरी कभी भी ट्रेन में भेंडर्स से या यात्रियों से ही बेवजह मुँह नहीं लगाऊँगी। "ये कसम आज तक निभाती हूँ। 







"मुंबई की लोकल ट्रेन"

       "मुंबई की लोकल ट्रेन" इससे कौन परिचित नहीं है। सर्वे बताती है कि रोजाना  लगभग 75 लाख लोग इस ट्रेन से सफर करते हैं। तो मान ल...