गुरुवार, 14 मई 2020

जब लिट्टी खाना महंगा पड़ा

  

   बात उन दिनों की हैं जब मैं 9 वी क्लास में थी। मैं और पापा,  दुमका ( झारखंड ) से मुजफ्फरपुर (बिहार) की  ट्रेन में सफर कर रहे थे।उन दिनों रिजर्वेशन का खास मसला नहीं होता था। जेनरल कम्पार्टमेंट में भी सफर आरामदायक ही होता था। आज की जैसी आपा -धापी तो थी नहीं। ज्यादा से ज्यादा सफर जरूरतवश ही की जाती थी। ट्रेन में खोमचे वालों ( खाने -पीने का समान बेचने वाले ) का आना- जाना भी लगा रहता था। खाते-पीते सफर आराम से कट जाता था। बिहार की एक खास पकवान लिट्टी -चोखा उस लेन में ज्यादा से ज्यादा बिकने वाली लाज़बाब पकवानो में से एक होता था। 
    ट्रेन अपनी रफ्तार से चली जा रही थी ,रात के करीब आठ बजे थे, एक लिट्टी -चोखा बेचने वाला हमारी कम्पार्टमेंट में चढ़ा। अपनी लिट्टी- चोखे की तारीफ करता हुआ , वो बार बार पैसेंजरों को उन्हें खाने के लिए उकसाने की कोशिश कर रहा था। सबके पास जाकर बोलता -" भाई जी आप लेलो ,अंकल जी आप खा लो बस दस में चार दे रहा हूँ। " मगर कोई भी उसकी ओर ध्यान नहीं दे रहा था। सब घर से लाए अपने खाने को खाने में लगे रहें। जब नौ बजने को आया तो अचानक उसके सुर में बदलाव आ गया ,उसने कहा -"  अरे ,भाइयों एक घंटे में गोंडा स्टेशन आ जाएगा.. मैं वहाँ उतर जाऊँगा ..मेरा वही घर हैं न ...अब मेरी लिट्टी तो बिकी नहीं घर जाकर इसे फेकना ही होगा ....आप में से जो कोई भी भूखा हो और खाना चाहते हो वो आकर खा ले ...फेकने से अच्छा हैं किसी के पेट में चला जाए ....फ़िक्र ना करे मैं फ्री में खिलाऊँगा ....एक पैसा भी नहीं लूँगा। "
   फिर क्या था सब भूखे भेड़िये की तरह उसकी लिट्टी पर टूट पड़े हर एक ने जी भरकर खाया ,उसने पापा से भी कहा -" अरे ,अंकल जी आप नहीं खोओगे ,अरे खाओ- खाओ में पैसे नहीं लूंगा "पापा मेरे बड़े मधुरभाषी थे उन्हेने बड़े प्यार से कहा -"अरे ,बेटा जी आप आने में देर कर दिए थे....हम तो आपके आने से पहले ही खाना खा चुके थे वरना लिट्टी तो मेरा पसंदीदा हैं.... आप बीस के चार भी देते तो खा लेता ....लेकिन अब नहीं ,आपकी लिट्टी फ्री हैं मेरा पेट तो नहीं " फिर पापा धीरे से मुझसे बोले -" बेटा मुझे तो दाल में कुछ काला लग रहा हैं ,आप चुपचाप जाकर ऊपर वाले बर्थ पर सो जाओं। " मैं  सोने चली गई। मगर नींद कहाँ आ रही थी बस सोने का नाटक कर रही थी। 
    जब लिट्टी वाले की टोकरी खाली हो गई तब वो बड़े अड़ियल अंदाज़ में बोला -" क्युँ भईया सब का पेट भर गया न।" सब डकार मरते हुए खुश होकर बोले -" अरे भाई ,बहुत बहुत धन्यवाद तुमको ...आज तो मज़ा आ गया।" अब लिट्टी वाले ने फिर अपना  सुर बदला -"  भईया जी, आपके धन्यवाद का मैं आचार डालूंगा क्या .....धन्यवाद नहीं पैसे निकले ....दस का एक के हिसाब से....समझे।" अब बारी सभी के चौकने की थी ,सब एक सुर में बोले -" तुमने कहा था कि- फ्री हैं ?"  उसने गंदी गाली देते हुए कहा -" बाप का माल समझे थे....एक घंटे से मैं सबकी मिन्नत कर रहा था कि -कोई तो गरीब पर तरस खा ले और मेरी कुछ लिट्टी तो बिक जाए ....मगर किसी को भूख नहीं थी और फ्री का सुनते ही सबके पेट में कुआ बन गया सब ठूँसने लगे .....अब पैसे निकालों नहीं तो एक एक को खींचकर ट्रेन से नीचे फेक दूंगा..... अरे, सच तो सिर्फ अंकल जी लोग बोल रहे थे ...चलो अंकल जी,  आप सब ऊपर बर्थ पर जाकर सो जाओं.... अब मैं इनका पेट खाली करने वाला हूँ- वो पापा और उनके साथ ही बैठे दो तीन बुजुर्गो की तरफ देखते हुए बोला.... फिर मेरी तरफ देखते हुए बोला -अच्छा हैं बिटिया सो गई है ....चलो बिटिया,  तुम अपना मुँह उस तरफ कर लो।" मैं समझ गई अब तो कुछ भयंकर होने वाला हैं क्योकि गोंडा के किस्से बड़े प्रसिद्ध थे  ,मैंने झट मुँह फेर लिया। 
    वो  जब लिट्टी खिला रहा था तो बड़े ही चालाकी से ये कहते हुए कि -" अरे भईया आपने तो अभी दो ही लिए दो और लेना " उसने सबकी लिट्टी की गिनती  भी कर ली थी और सबसे कबुलवा भी लिया था, तो झूठ बोलने की गुंजाइश थी नहीं किसी के पास। जो लोग लालची तो थे मगर थोड़ा सरीफ थे,  वो तो डरकर पैसे निकालने लगे।मगर कुछ लोग जो खुद को उससे बड़ा गुंडा समझते थे भिड़ गए उससे। बाता -बाती ,गाली -गलौज,हाथापाई तक होने लगा।  ट्रेन के गोंडा स्टेशन पर रुकाते ही उस लिट्टी वाले ने जोर से मुँह से कुछ आवाज़ निकली ( शायद कोई कोडबर्ड था )उसकी आवाज़ सुनते ही एक मिनट भी नहीं लगा सेकड़ो भेंडर्स इकट्ठे  हो गए ,यात्रियों को खींच खींचकर ट्रेन से उतारने लगे। रलवे के स्टाफ ,टी.सी ,सब आ गए। टी. सी. ने सबको समझाया- इनसे टककर लेने का कोई फायदा नहीं... तुम सब जब तक पैसे नहीं दोगे ट्रेन आगे नहीं बढ़ेगी... पाँच मिनट में ही सारे गाँववाले भी इकट्ठे हो जाएंगे फिर तो मार -काट ही मच जाएगा। आख़िरकार यात्रियों को पैसे देने ही पड़े वो भी दस के एक के हिसाब से। पुरे कम्पार्टमेंट में बस सात लोग ( मुझे और पापा को लेकर ) थे जिन्होंने लिट्टी नहीं खाई थी ,हम ट्रेन में ही थे मगर किसी अनहोनी के डर से हमारा गला भी सुख रहा था। खैर ,आधे घंटे के लफड़े के बाद ट्रेन वहाँ से रवाना हुई और हमारी जान में जान आई। 
  फ्री के खाने का संस्कार तो हमारा था नहीं फिर भी उस दिन ये दो कसम जरूर खा ली मैंने कि -" भूख से मर जाऊँगी मगर फ्री का नहीं खाऊँगी और दूसरी कभी भी ट्रेन में भेंडर्स से या यात्रियों से ही बेवजह मुँह नहीं लगाऊँगी। "ये कसम आज तक निभाती हूँ। 







33 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १५ मई २०२० के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. मेरी संस्मरण को स्थान देने के लिए और मेरी रचना के पंक्तियों को आज का शीर्षक बनाने के लिए तहे दिल से आभार आपका श्वेता जी ,सादर नमन

      हटाएं
  2. ओह!!!ये फ्री की लिट्टी तो बड़ी मँहगी पड़ी सभी को...वैसे फ्री का खाने वालों को सबक तो मिलना ही चाहिए...
    बहुत सुन्दर संस्मरण ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सहृदय धन्यवाद सुधा जी ,मेरा संस्मरण आपको पसंद आया लिखना सार्थक हुआ ,सादर नमन

      हटाएं
  3. मुफ़्त का चक्कर ही बहुत खराब होता है।

    सादर

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सहृदय धन्यवाद सर ,आपकी उपस्थिति से लेखन को सार्थकता मिली ,सादर नमन

      हटाएं
  4. हम तो खोमचे वाले की टीम के ही हैं😀। बहुत शिक्षाप्रद संस्मरण।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सहृदय धन्यवाद विश्वमोहन जी ,आपकी प्रतिक्रिया से लेखन सार्थक हुआ ,सादर नमन

      हटाएं
  5. 😄😄 बहुत खूब सखी। ये भी खूब रही , लिट्टी ने बहुत बड़ा सबक सिखा दिया। मुख पर मुस्कान बिखेरता ये शिक्षाप्रद
    संस्मरण बहुत रोचक है। 👌👌 हार्दिक शुभकामनायें सखी , इस सफर के अगले किसी का इंतजार है 😊😄💐💐

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. दिल से शुक्रिया सखी ,मेरा संस्मरण तुम्हे पसंद आया और मुख पर मुस्कान लाने में सक्षम हुआ ,जान कर हार्दिक प्रसन्नता हुई ,स्नेह

      हटाएं
  6. उत्तर
    1. सहृदय धन्यवाद प्रतिभा जी ,आपकी उपस्थिति से ही मेरा लेखन सार्थक हो गया ,सादर नमन

      हटाएं
  7. मुफ़्त ने देख भूख़ बढ़ जाती है कई लोगों की लेकिन वह हज़म हो जाय सबको जररी नहीं कीमत ती चुकानी ही पड़ती है आखिर
    बहुत अच्छी प्रेरक प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. दिल से शुक्रिया सखी ,मेरा संस्मरण तुम्हारे मुख पर मुस्कान लाने में सक्षम हुआ ,जान कर ख़ुशी हुई ,स्नेह

      हटाएं
  8. सुन्दर संस्मरण। मुख से है या भूख से?

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सहृदय धन्यवाद सर ,गलतियों की ओर ध्यान दिलाने के लिए शुक्रिया ,सादर नमन

      हटाएं
  9. वाह!सखी ,बहुत सुंदर संस्मरण 👌👌

    जवाब देंहटाएं
  10. चर्चा मंच पर मेरी रचना को स्थान देने के लिए दिल से आभार मीना जी ,सादर नमन

    जवाब देंहटाएं
  11. ओह ! खतरनाक संस्मरण ! लिट्टी वाला बहुत ही खतरनाक आदमी था ! रेलवे वाले भी ज़रूर मिले हुए होंगे उससे वरना फ्री खिलाने का झूठा प्रोमिस ऐसे ही नहीं कर देता वो ! सब परिचित होंगे उसके तरीकों से ! और उनका समर्थन मिलता होगा उसे तब ही इतनी दादागिरी दिखा सका वह !

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. दिल से धन्यवाद दी ,आप को अपने नए ब्लॉग पर पाकर हार्दिक ख़ुशी हुई ,हाँ ,अपने सही कहा उस लेन में अक्सर ऐसी दादागिरी देखने को मिल ही जाती हैं ,रेलवे स्टाफ से लेकर गाँव वाले तक मिले होते हैं। लेकिन ज्यादा दुःख तो लोगो की मानसिकता पर होती हैं अगर वो फ्री का लालच नहीं करते तो ऐसी मुसीबत का सामना ही नहीं करना पड़ता ,आभार दी मेरे संस्मरण पर प्रतिक्रिया देने के लिए ,सादर नमन

      हटाएं
  12. अजनाने ही कितनी बार ऐसा हो जाता है ... पर जीवंन में ऐसे पल हमेशा याद रह जाते हैं ... रोचक किस्सा ...

    जवाब देंहटाएं
  13. सहृदय धन्यवाद दिगम्बर जी ,हाँ ,सही कहा आपने ,प्रतिक्रिया देने के लिए हृदयतल से आभार आपका ,सादर नमस्कार

    जवाब देंहटाएं
  14. लिट्टी-चोखा बिहारी संस्कृति की अमूल्य पहचान हैं...

    जवाब देंहटाएं
  15. पर जो भी हो, फ्री का, वो भी ट्रेन में और एक अनजान लिट्टी वाले से ? खानेवालों की मति मारी गई थी। अपने पतिदेव को भी यह किस्सा जरूर सुनाऊँगी, वे बहुत यात्राएँ करते हैं।

    जवाब देंहटाएं

kaminisinha1971@gmail.com